सम्राट विक्रमादित्य की न्याय और सुशासन की विरासत आज भी प्रासंगिक है। मध्यप्रदेश सरकार के कार्यक्रमों और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान के माध्यम से यह आदर्श नई पीढ़ी तक पहुँचाए जा रहे हैं।
09 अप्रैल।
सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन और न्याय की कथाएं हमारी ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विरासत इतिहास हो सकती है, लेकिन सुशासन और न्याय की आवश्यकता सदैव प्रासंगिक रहती है। यदि इतिहास से सबक लेकर वर्तमान में सुशासन के प्रभावी मॉडल विकसित किए जाएं, तभी यह विरासत सार्थक रूप में समाज के सामने आएगी।
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सम्राट विक्रमादित्य की विरासत को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने के प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य की सीमाओं से बाहर जाकर विक्रमादित्य महानाट्य का मंचन और उनके नाम पर एक करोड़ रुपए के अंतर्राष्ट्रीय सम्मान की शुरुआत इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। हाल ही में काशी में इस महानाट्य का आयोजन हुआ, इससे पहले दिल्ली में भी इसका मंचन किया जा चुका है। इन आयोजनों में उच्च स्तर की राजनीतिक उपस्थिति इस पहल के महत्व को रेखांकित करती है।
सम्राट विक्रमादित्य उज्जैयनी के शासक रहे और उनकी विरासत भारतीय शासन प्रणाली के आदर्शों का प्रतीक मानी जाती है। मध्यप्रदेश सरकार लंबे समय से उनके सुशासन और न्याय की अवधारणा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करती रही है। वर्तमान में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, जो उज्जैन से ही जुड़े हैं, इस विरासत को और अधिक प्रमुखता देने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि विरासत और संस्कृति का उपयोग केवल प्रस्तुतीकरण और प्रचार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इतिहास प्रेरणा दे सकता है, लेकिन वर्तमान की चुनौतियों का समाधान वर्तमान नीतियों और कार्यप्रणाली से ही संभव है। केवल अतीत की उपलब्धियों के आधार पर वर्तमान को सशक्त नहीं बनाया जा सकता।
सम्राट विक्रमादित्य सम्मान के लिए निर्धारित मानदंड—जिनमें न्याय, दानशीलता, सुशासन, विज्ञान, कला, शौर्य, राजनय और समाज कल्याण जैसे गुण शामिल हैं—उच्च आदर्शों को दर्शाते हैं। लेकिन यही अपेक्षाएं नागरिक राज्य सरकार से भी रखते हैं। यदि इन मूल्यों को शासन प्रणाली में व्यवहारिक रूप से लागू किया जाए, तो यह किसी भी सम्मान से अधिक प्रभावशाली होगा।
वर्तमान समय में जन समस्याएं, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं। भोपाल जैसे शहर में बड़े तालाब पर अतिक्रमण जैसे मामलों में भी प्रभावी कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक चुनौतियों को उजागर करता है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या शासन प्रणाली इन आदर्शों पर खरा उतर पा रही है।
सुशासन का मूल सिद्धांत यही है कि जनधन का उपयोग कितनी पारदर्शिता और जनहित में हो रहा है। विरासत और संस्कृति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन शासन का प्राथमिक दायित्व जनकल्याण और विकास है। केवल सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से शासन की प्रभावशीलता को नहीं मापा जा सकता।
सम्राट विक्रमादित्य की विरासत पर आधारित महानाट्य और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान निश्चित रूप से सकारात्मक पहल हैं, लेकिन उनकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब इनसे प्रेरित होकर शासन प्रणाली में ठोस सुधार दिखाई दें। यदि वर्तमान व्यवस्था में सुशासन और न्याय के सिद्धांत प्रभावी रूप से लागू होते हैं, तो यह किसी भी आयोजन से कहीं अधिक बड़ा संदेश होगा।
नागरिक यही अपेक्षा करते हैं कि राज्य में विक्रमादित्य जैसे शासन की केवल चर्चा ही न हो, बल्कि उसे व्यवहार में भी उतारा जाए। यदि ऐसा संभव हो पाया, तो विरासत अपने आप जीवंत हो जाएगी और समाज में उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।