भोपाल, 10 अप्रैल 2026।
मध्यप्रदेश में मातृ और शिशु स्वास्थ्य की गंभीर स्थिति के बीच अब गर्भावस्था या प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु के सही कारणों का पता लगाने के लिए एम्स भोपाल ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है, जिसके तहत क्लिनिकल ऑटोप्सी की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है और रिपोर्ट लगभग डेढ़ घंटे में तैयार हो जाती है।
प्रदेश में स्वास्थ्य संकेतकों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है, जहां प्रति एक लाख प्रसव पर 159 माताओं की और प्रति एक हजार जन्म पर 40 नवजातों की मृत्यु दर्ज की जा रही है, जो यह दर्शाता है कि समय पर इलाज और सुरक्षित प्रसव सुविधाओं की कमी गंभीर समस्या बनी हुई है।
अधिकारियों के अनुसार कई मामलों में महिलाओं की मृत्यु के वास्तविक कारण स्पष्ट नहीं हो पाते, जिससे सुधारात्मक कदम उठाने में बाधा आती है, ऐसे में एम्स भोपाल की यह नई पहल इन कारणों को वैज्ञानिक तरीके से समझने में मदद करेगी।
इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूरी तरह निःशुल्क है और इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं रहती, जबकि यह जांच परिवार की सहमति से की जाती है, जिससे परिजनों को सच्चाई जानने का अवसर मिलता है और सरकार को भी सटीक डेटा प्राप्त होता है।
मातृ मृत्यु का अर्थ गर्भावस्था के दौरान, प्रसव के समय या गर्भसमापन के 42 दिनों के भीतर महिला की मृत्यु से है, और विशेषज्ञों के अनुसार इसे रोकना स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी जिम्मेदारियों में से एक है।
एम्स भोपाल में की जा रही यह क्लिनिकल ऑटोप्सी मेडिको-लीगल ऑटोप्सी से अलग है, जिसमें पुलिस की आवश्यकता नहीं होती और शरीर के आवश्यक हिस्सों की वैज्ञानिक जांच कर मृत्यु के वास्तविक कारणों की पहचान की जाती है।
इस जांच के बाद डॉक्टर हिस्टोपैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी आधारित रिपोर्ट तैयार करते हैं, जिसे कुछ ही दिनों में परिवार को सौंप दिया जाता है, जिससे उन्हें मृत्यु के कारणों और संभावित लापरवाहियों की स्पष्ट जानकारी मिलती है।
इस पहल से सरकार को मातृ मृत्यु से संबंधित विश्वसनीय और प्रमाणित डेटा मिलेगा, जिसके आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, संसाधनों की कमी और उपचार व्यवस्था की खामियों को दूर करने की दिशा में ठोस रणनीति बनाई जा सकेगी।
एसआरएस मातृ बुलेटिन 2020-22 के अनुसार मध्यप्रदेश में मातृ मृत्यु दर 159 है, जबकि देश का औसत 88 है, जो इसे गंभीर स्थिति वाले राज्यों में शामिल करता है।
तुलनात्मक रूप से उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ का मातृ मृत्यु दर 141 है, ओडिशा का 136 है, जबकि केरल 18 और महाराष्ट्र 36 के साथ बेहतर मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
यह प्रक्रिया लगभग डेढ़ घंटे में पूरी की जाती है और इसमें पूरे सम्मान और सावधानी का ध्यान रखा जाता है, जहां केवल आवश्यक ऊतक जांच के लिए लिए जाते हैं और बाद में सभी अंगों को सुरक्षित रूप से शरीर में पुनः रखकर शरीर को परिवार को सौंपा जाता है।
डॉक्टरों के अनुसार इस प्रक्रिया में परिजन सीधे विशेषज्ञों से बातचीत कर सकते हैं, जिससे उनकी शंकाएं दूर होती हैं और पारदर्शिता बनी रहती है, वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि सही समय पर कारणों की पहचान से भविष्य में कई मौतों को रोका जा सकता है।





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