भोपाल, 14 अप्रैल।
डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर विश्व संवाद केंद्र, मध्य प्रदेश द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान में “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और डॉ. अंबेडकर” विषय पर विस्तृत विचार व्यक्त किए गए, जिसमें सामाजिक समरसता और अंबेडकर के विचारों के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया।
इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि 2 जनवरी 1940 को सतारा के कराड में डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में पहुंचे थे, जहां उन्होंने सामाजिक समरसता का अनुभव किया था। ‘केसरी’ समाचार पत्र में प्रकाशित विवरण के अनुसार उन्होंने कुछ मतभेदों के बावजूद संघ के कार्य की प्रशंसा की थी। यह विचार मुख्य वक्ता मप्र लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एवं आरएसएस मध्यभारत प्रांत के प्रांत संघचालक अशोक पांडे ने व्यक्त किए।
उन्होंने आगे कहा कि पुणे के संघ शिक्षा वर्ग में भी डॉ. अंबेडकर शामिल हुए थे, जहां उन्होंने स्वयंसेवकों के बीच सामाजिक समरसता का वातावरण देखा। साथ ही उन्होंने 1949 में सरसंघचालक श्रीगुरुजी और डॉ. अंबेडकर की भेंट का भी उल्लेख किया। अशोक पांडे ने कहा कि केशव बलिराम हेडगेवार ने 1920 में ही शोषणमुक्त समाज की अवधारणा प्रस्तुत कर दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून से समानता स्थापित की जा सकती है, लेकिन वास्तविक समरसता केवल आत्मीयता और बंधुत्व से ही संभव है।
उन्होंने यह भी कहा कि 1963 में माधव सदाशिव गोलवलकर के मार्गदर्शन में समरसता का संदेश समाज तक पहुंचा, जिसे बाद में बालासाहब देवरस ने और विस्तार दिया। उनके अनुसार मंदिर, कुआं और श्मशान जैसे प्रतीकों के माध्यम से सामाजिक एकता का भाव विकसित किया गया, जिससे समाज के समग्र कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित बाबा साहब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ के पूर्व कुलाधिपति प्रकाश बरतूनिया ने कहा कि मध्यप्रदेश के लिए यह गर्व का विषय है कि डॉ. अंबेडकर का जन्म इसी भूमि पर हुआ। उन्होंने बताया कि अंबेडकर ने विश्व के अनेक संविधानों का अध्ययन कर भारतीय इतिहास और दर्शन को आत्मसात किया, जिससे उनके विचारों में भारतीय जीवन मूल्यों की स्पष्ट झलक मिलती है।
उन्होंने आरक्षण, समरसता, संविधान निर्माण, धर्म और राष्ट्र से जुड़े अंबेडकर के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उनके संबंधों को लेकर फैले भ्रम को समझने के लिए धनंजय कीर और दत्तोपंत ठेंगड़ी के लेखन का अध्ययन आवश्यक है।
प्रस्तावना रखते हुए विश्व संवाद केंद्र मध्यप्रदेश के सचिव लोकेंद्र सिंह ने कहा कि डॉ. अंबेडकर को किसी एक विचारधारा या वर्ग तक सीमित करना उनके व्यापक व्यक्तित्व के साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि वे धर्म, अर्थव्यवस्था, इस्लाम, साम्यवाद और राष्ट्र जैसे विषयों के गहन अध्ययनकर्ता थे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संबंधों को योजनाबद्ध तरीके से नजरअंदाज किया गया है, जिसे समझने के लिए दत्तोपंत ठेंगड़ी के साहित्य का अध्ययन आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व संवाद केंद्र मध्यप्रदेश के अध्यक्ष लाजपत आहूजा ने की। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि आर्य इसी भूमि के मूल निवासी हैं और उन्हें युगनायक बताया। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने प्रारंभ से ही उनके विचारों को आत्मसात किया है।
कार्यक्रम के दौरान अंबेडकर साहित्य का स्टॉल आकर्षण का केंद्र रहा, जहां उपस्थित लोगों ने उनके ग्रंथों का अवलोकन किया। साथ ही “हिंदू गर्जना” के गो-विशेषांक का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन सृष्टि झा ने किया तथा आभार प्रदर्शन विश्व संवाद केंद्र न्यास के पूर्व अध्यक्ष एवं संस्थापक न्यासी लक्ष्मेंद्र माहेश्वरी ने किया। बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता और युवा उपस्थित रहे।









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