मंदसौर, 12 जून।
मंदसौर की धरती से निकलीं मीनाक्षी नटराजन की राज्यसभा चुनाव में हार केवल एक सीट का गणित नहीं, बल्कि कांग्रेस की आंतरिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करती है। चर्चा हार की हो रही है, लेकिन उस रहस्यमयी चुप्पी पर कोई सवाल नहीं उठा रहा जिसने नामांकन को नामंजूरी तक पहुंचा दिया। कमलनाथ दिल्ली से दूर रहे, दिग्विजय सिंह की ओर से भी कोई सक्रियता नजर नहीं आई।
उधर, पार्टी का एक वरिष्ठ नेता कुछ समय पहले सत्ताधारी दल के शीर्ष नेतृत्व और एक संवैधानिक पद पर आसीन माननीय से मुलाकात कर चुका था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह रणनीतिक चूक थी या प्रायोजित हादसा।
बताया गया कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन प्रस्तावकों के हस्ताक्षर और शपथ पत्र संबंधी तकनीकी कमियों के कारण निरस्त हुआ। लेकिन राजनीति में तकनीकी भूल तब ही सामने आती है जब तैयारी और नीयत दोनों कमजोर हों। राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में कांग्रेस के विधि विशेषज्ञों ने दस्तावेजों की पूर्व जांच क्यों नहीं की? पार्टी में कई वरिष्ठ कानूनी दिग्गज मौजूद होने के बावजूद इतनी बुनियादी त्रुटियां कैसे रह गईं? यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहे हैं।
जब नामांकन दाखिल किया जा रहा था, तब भोपाल से दिल्ली तक सन्नाटा क्यों था? 2019 की लोकसभा हार के बाद मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा भेजने की चर्चा पार्टी के भीतर रही, फिर अंतिम समय में उन्हें अकेला क्यों छोड़ दिया गया? इसी बीच एक वरिष्ठ नेता की सत्तापक्ष से मुलाकात और उसके बाद उठी राजनीतिक चर्चाओं ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
कांग्रेस में भीतरघात कोई नई बात नहीं है। पहले भी दल-बदल और आंतरिक असंतोष के कारण पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। लेकिन इस मामले में लड़ाई नहीं, बल्कि समर्पण जैसा माहौल दिखाई देता है। वरिष्ठ नेता मौन रहे, कानूनी सहायता समय पर नहीं मिली और अंततः नामांकन ही निरस्त हो गया। यह संगठित चुप्पी हार से अधिक चिंताजनक मानी जा रही है।
अब कांग्रेस चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटा रही है, लेकिन कानूनी जानकार मानते हैं कि नामांकन निरस्त होने के बाद राहत की संभावना सीमित होती है। यदि जांच में यह सामने आता है कि त्रुटि पार्टी के अपने स्तर पर हुई, तो राजनीतिक और नैतिक दोनों प्रकार का नुकसान और बढ़ सकता है।
मीनाक्षी नटराजन राहुल गांधी की टीम का प्रमुख चेहरा रही हैं। उनकी हार युवा और महिला कार्यकर्ताओं के बीच भी नकारात्मक संदेश छोड़ सकती है। भाजपा के लिए यह मुद्दा राजनीतिक अवसर बन सकता है, क्योंकि विपक्ष की यह चूक उसी पर भारी पड़ती दिख रही है। आखिरकार सवाल यही है कि कांग्रेस तकनीक से हारी या अपनी ही आंतरिक कमजोरियों और मौन सहमति से। जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक हर हार के पीछे भीतरघात की आशंका बनी रहेगी और कार्यकर्ताओं का भरोसा लौटाना पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगा।












