नई दिल्ली, 12 जून।
भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा कर दिया गया है। एक ओर एक्सप्रेस-वे, खनन परियोजनाएं, औद्योगिक कॉरिडोर और नई ऊर्जा परियोजनाएं हैं, तो दूसरी ओर सिकुड़ते जंगल, घटता भूजल, बढ़ता तापमान और लगातार चरम होती प्राकृतिक आपदाएं। सवाल यह नहीं कि विकास हो या पर्यावरण, बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत आज भी 50 साल पुराने विकास मॉडल पर चलना चाहता है?
विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टें बताती हैं कि प्राकृतिक आपदाओं से होने वाला आर्थिक नुकसान लगातार बढ़ रहा है। भारत में हर साल बाढ़, भूस्खलन, हीटवेव और सूखे से हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति नष्ट होती है। यह नुकसान किसी पर्यावरणवादी का तर्क नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था पर सीधा बोझ है। यानी पर्यावरण की अनदेखी विकास को ही महंगा बना रही है।
समस्या की जड़ पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में भी है। अधिकांश परियोजनाओं में पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) को केवल औपचारिकता मान लिया जाता है। रिपोर्टें अक्सर परियोजना प्रस्तावकों के खर्च पर तैयार होती हैं और स्थानीय समुदायों की आपत्तियां कागजों में दब जाती हैं। परिणाम यह होता है कि सड़कें और बांध बनते हैं, लेकिन कुछ वर्षों बाद भूस्खलन, जलभराव या पारिस्थितिक क्षति के कारण उन्हीं पर अरबों रुपये दोबारा खर्च करने पड़ते हैं।
इसका समाधान केवल पेड़ लगाने के सरकारी अभियान नहीं हैं। पहला कदम यह होना चाहिए कि पर्यावरण मंजूरी देने वाली एजेंसियों को पूरी तरह स्वतंत्र बनाया जाए और उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक जांच के लिए अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराई जाए। दूसरा, प्रत्येक बड़ी परियोजना के लिए "नेचर कॉस्ट अकाउंटिंग" लागू हो, जिसमें जंगल, जलस्रोत और जैव विविधता के नुकसान का आर्थिक मूल्य भी परियोजना लागत में जोड़ा जाए। जब पर्यावरणीय क्षति की वास्तविक कीमत सामने आएगी, तब निर्णय अधिक संतुलित होंगे।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण समाधान यह है कि विकास परियोजनाओं की सफलता का आकलन केवल निर्माण लागत या समयसीमा से नहीं, बल्कि अगले 20 वर्षों तक उनके पर्यावरणीय प्रभाव से किया जाए। यदि कोई सड़क पांच हजार पेड़ काटकर बनती है, तो उसके साथ वन्यजीव गलियारे, वर्षा जल संरक्षण और स्थानीय हरित क्षेत्र विकसित करना भी कानूनी दायित्व होना चाहिए, न कि कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व का वैकल्पिक हिस्सा।
भारत को आज "ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर" की ओर बढ़ना होगा, जहां इंजीनियरिंग और पारिस्थितिकी साथ चलें। दुनिया के कई देशों ने सुरंगों, एलिवेटेड कॉरिडोर और वन्यजीव ओवरपास के जरिए विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित किया है। भारत में भी यह तकनीकी क्षमता मौजूद है, जरूरत केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीति की प्राथमिकता बदलने की है।
विकास का अर्थ केवल कंक्रीट का विस्तार नहीं होता। यदि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल और स्थिर जलवायु नहीं मिली, तो आज की चमकदार परियोजनाएं कल की सबसे बड़ी आर्थिक भूल साबित होंगी। असली विकास वही है जो प्रकृति की कीमत पर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ साझेदारी में आगे बढ़े।












