15 जून, कोलकाता।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट सांसदों द्वारा अपनी पार्टी की संसदीय इकाई पर कब्जा करने का विचार त्यागकर त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल होने के निर्णय ने राज्य की राजनीति को नया मोड़ दिया है। इस उलटफेर के पीछे राजनीतिक पर्यवेक्षक तृणमूल के आंतरिक संविधान को मुख्य कारण मान रहे हैं। पार्टी के मौजूदा नियमों के तहत निर्णय लेने का सर्वोपरि अधिकार राष्ट्रीय कार्यसमिति के पास है, जिस पर ममता बनर्जी और उनके करीबी नेतृत्व का पूर्ण वर्चस्व है।
कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि संगठनात्मक ढांचे में पदाधिकारियों को निर्वाचित प्रतिनिधियों से अधिक शक्तियां प्राप्त हैं, जिसके चलते बागी गुट के लिए पार्टी के चुनाव चिह्न और वित्तीय कोष पर अपना दावा पेश करना एक कठिन चुनौती थी। इस बाधा को भांपते हुए उन्होंने भीतर ही संघर्ष करने की बजाय एक नई राजनीतिक इकाई से जुड़ना अधिक श्रेयस्कर समझा।
वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य विकास रंजन भट्टाचार्य ने इस प्रकरण में भाजपा की सक्रिय भूमिका होने का दावा किया है। उनका तर्क है कि हाल ही में हुई कुछ उच्च-स्तरीय बैठकों से यह संकेत मिलते हैं कि केंद्रीय सत्ता इस नए समीकरण का उपयोग संसद में अपने विधायी कार्यों को सुगम बनाने के लिए कर सकती है। राज्य नेतृत्व द्वारा आंतरिक समितियों को भंग कर वफादार समर्थकों को नियुक्त करने की त्वरित कार्रवाई ने भी बागियों को पार्टी से पूरी तरह अलग होकर अपनी अलग राह तलाशने के लिए बाध्य कर दिया।













