जिलों में रहते हुए जिन साहब की पार्टियां विभाग में चर्चा का विषय रहती थीं, वे इन दिनों असाधारण शांति में हैं। साथियों ने छेड़ा- "सर, पार्टी कब है?" साहब ने लंबी सांस लेकर जवाब दिया- "भरे पेट सब अच्छा लगता है।"
असल परेशानी यह है कि अब लूप लाइन में हैं और पार्टी का बिल अपनी जेब से देना पड़ता है। सरकारी मलाई हटते ही स्वाद भी फीका पड़ गया है।


















