देहरादून, 20 जून।
पहाड़ बुलाते हैं, पर अब वे कराह भी रहे हैं। मैदानों की तपती धरती और बढ़ती गर्मी से बचने के लिए उमड़ती बेतहाशा भीड़ आज पूरे हिमालयी तंत्र के लिए खतरे की घंटी बन चुकी है। रोहतांग दर्रे से मंडी तक घंटों का जाम, शिमला और मसूरी की सड़कों पर लाखों वाहन तथा नैनीताल और मनाली की झीलें प्लास्टिक से पट चुकी हैं। यह पर्यटन नहीं, पहाड़ों पर आबादी का आक्रमण है। साथ ही आस्था के नाम पर चारधाम यात्रा ने भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। नतीजा यह है कि पहाड़ों की स्वच्छ हवा प्रदूषित हो रही है, नदियां सिकुड़ रही हैं और जमीन दरक रही है। सरकारी तंत्र की अव्यवस्था और कुप्रबंधन ने हालात को बद से बदतर कर दिया है।
सरकारी आंकड़े डराते हैं। 5 जून तक केदारनाथ में 12 लाख और बद्रीनाथ में 11 लाख से अधिक यात्री पहुंच चुके हैं। कैंची धाम से लेकर हेमकुंड साहिब तक हर जगह लंबा जाम और अव्यवस्था आम बात है। जोशीमठ में केवल एक महीने में टनों प्लास्टिक कचरा निकला, जिसमें अधिकांश पानी की बोतलें थीं। विशेषज्ञ वर्षों से आगाह कर रहे हैं कि नैनीताल, मसूरी और शिमला अपनी भार वहन क्षमता पार कर चुके हैं। मनाली में पिछले तीन दशकों में सीमेंट आधारित निर्माण 5 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत से अधिक हो गया है। नीति आयोग और गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान की रिपोर्टें साफ कहती हैं कि अनियंत्रित पर्यटन और जंगलों का विनाश हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद कर रहा है, परंतु सुन कौन रहा है।
चारधाम यात्रा कभी तप, त्याग और प्रकृति से जुड़ाव का नाम थी। आज वह हेलीकॉप्टर पैकेज, वीआईपी दर्शन और लग्जरी कैंप में बदल गई है। केदारनाथ में बढ़ती हवाई सेवाएं कार्बन उत्सर्जन और ध्वनि प्रदूषण का नया कारण बन गई हैं। श्रद्धालु कम, रील बनाने वाले पर्यटक ज्यादा दिखते हैं। प्रतिबंधित क्षेत्रों में सेल्फी, नदियों में प्लास्टिक और डीजे की धुन पर नाचना - यह कैसी आस्था है? ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था है, परंतु स्लॉट से तीन गुना भीड़ पहुंच जाती है। प्रशासन बैरिकेड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। भीड़ प्रबंधन के नाम पर केवल लाठी और धक्का है। न पानी, न शौचालय और न ही पर्याप्त चिकित्सा सुविधा। आपदा आई तो सब भगवान भरोसे।
सरकार ऑल वेदर रोड, रोपवे और सुरंगों को विकास बता रही है, परंतु विकास की कीमत कौन चुका रहा है? सड़क चौड़ी हो रही है, पर नालियां बंद हैं। होटल हर पहाड़ी पर उग आए हैं, पर सीवेज सीधे नदियों में गिर रहा है। 2013 की केदारनाथ आपदा और 2023 का जोशीमठ भू-धंसाव हम भूल चुके हैं। पहाड़ों में निर्माण के लिए न भूगर्भीय सर्वे की चिंता है और न पर्यावरणीय मंजूरी की। बस टेंडर पास करो और पहाड़ काट दो। नतीजा भूस्खलन, बादल फटना और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। सरकारी तंत्र मूकदर्शक बना हुआ है। कुप्रबंधन का आलम यह है कि एक पुल बनने में 10 साल लगते हैं, पर टूटने में 10 मिनट।
इस बेतहाशा भीड़ का सबसे बुरा असर स्थानीय लोगों पर पड़ रहा है। शिमला में आम आदमी को सप्ताह में दो दिन पानी मिलता है, पर पांच सितारा होटलों के स्विमिंग पूल लबालब रहते हैं। सेब के बाग काटकर कॉटेज बनाए जा रहे हैं। युवा पलायन कर रहे हैं, क्योंकि पर्यटन से केवल तीन महीने की मौसमी मजदूरी मिलती है। आपदा में सबसे पहले स्थानीय लोगों के घर गिरते हैं। पर्यटक को हेलीकॉप्टर से बचा लिया जाता है, पर पहाड़ी को राहत के लिए हफ्तों इंतजार करना पड़ता है। पर्यटन से कमाई होटल मालिकों और टूर ऑपरेटरों की होती है, जबकि कचरा, जाम और महंगाई का बोझ स्थानीय लोग उठाते हैं।
हमें समझना होगा कि पहाड़ों की गोद असीमित नहीं है। तीर्थयात्रा और पर्यटन का उद्देश्य प्रकृति का दोहन नहीं, संरक्षण होना चाहिए। इसके लिए पांच कदम तुरंत उठाने होंगे। पहला, कैरिंग कैपेसिटी कानून - वैज्ञानिक तरीके से हर शहर और हर धाम की दैनिक यात्री सीमा तय हो और उससे एक भी व्यक्ति अधिक न जाए। ऑनलाइन स्लॉट समाप्त होने पर 'हाउसफुल' का बोर्ड लगे। दूसरा, हिमालयन ईको टैक्स - हर पर्यटक से 200 रुपये प्रतिदिन लिया जाए। यह राशि सीधे ग्राम पंचायतों को मिले, जो कचरा प्रबंधन और जंगल संरक्षण पर खर्च हो। तीसरा, निर्माण पर पांच वर्ष का मोरेटोरियम - कोई नया होटल या रिसॉर्ट नहीं, केवल स्थानीय पत्थर और लकड़ी के पारंपरिक होम-स्टे को अनुमति मिले। चौथा, यात्रा का डी-कंजेशन - मई-जून की भीड़ को अक्टूबर-नवंबर और फरवरी-मार्च में स्थानांतरित किया जाए तथा शीतकालीन चारधाम यात्रा को बढ़ावा दिया जाए। पांचवां, स्थानीय लोगों को मालिक बनाया जाए - पर्यटन नीति में पंचायतों को 50 प्रतिशत हिस्सेदारी और वीटो पावर मिले।
पहाड़ बचेंगे तभी तीर्थ बचेंगे। हिमालय भारत का वॉटर टावर और क्लाइमेट शील्ड है। गंगा और यमुना यहीं से निकलती हैं। अगर पहाड़ दरके तो मैदानों के करोड़ों लोगों की प्यास और आस्था दोनों खतरे में पड़ जाएंगी। आस्था का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब श्रद्धालुओं की सुरक्षा और पहाड़ की सेहत दोनों प्राथमिकता बनें। आधुनिक तकनीक, ऑनलाइन स्लॉट प्रणाली, ड्रोन से निगरानी और आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत करना होगा। परंतु सबसे जरूरी है नियत। सरकार को समझना होगा कि भीड़ जुटाना उपलब्धि नहीं, उसे सुरक्षित वापस भेजना ही सुशासन है। वरना वह दिन दूर नहीं जब हिमालय खुद एक बोर्ड लगा देगा - "प्रवेश निषेध, इंसानों के लिए खतरा।" तब न चारधाम रहेगा, न शिमला और मसूरी। बचेगा सिर्फ पछतावा, क्योंकि पहाड़ बोल नहीं सकते, पर जब टूटते हैं तो पूरी सभ्यता हिला देते हैं।


















