संपादकीय
20 Jun, 2026

भारतीय करी की खुशबू पर संकट: ब्रिटेन का सबसे पुराना भारतीय रेस्तरां वीरास्वामी उजड़ने की कगार पर

ब्रिटेन का सबसे पुराना भारतीय रेस्तरां वीरास्वामी अपनी लीज समाप्त होने के बाद बंद होने के खतरे का सामना कर रहा है, जिसे बचाने के लिए अब व्यापक समर्थन जुट रहा है।

लंदन, 20 जून।

स्वाद बचेगा तो इतिहास बचेगा। क्राउन एस्टेट के लिए यह सिर्फ एक प्रॉपर्टी डील है, परंतु 1.5 अरब भारतीयों और 18 लाख ब्रिटिश-भारतीयों के लिए यह भावनाओं का मामला है। विकास जरूरी है, पर जड़ों को काटकर नहीं। लंदन का स्काईलाइन बदले, पर उसकी आत्मा न बदले। अदालत का फैसला जो भी हो, वीरास्वामी ने 100 साल तक ब्रिटेन को भारत का स्वाद चखाया है। अब वक्त है कि ब्रिटेन वीरास्वामी को सम्मान लौटाए। वरना आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि करी की राजधानी लंदन ने अपने सबसे पुराने करी घर को क्यों उजाड़ दिया। लीज का कागज खत्म हो सकता है, पर विरासत नहीं। उम्मीद है कि क्राउन एस्टेट और ब्रिटिश सरकार इस फर्क को समझेंगे।

लंदन की रीजेंट स्ट्रीट पर पिछले 100 साल से महक रही करी की खुशबू अब बुझने की कगार पर है। ब्रिटेन का सबसे पुराना भारतीय रेस्तरां वीरास्वामी बंद होने के संकट से जूझ रहा है। वजह है क्राउन एस्टेट का लीज आगे न बढ़ाना। जून 2025 में लीज खत्म हो चुकी है और मकान मालिक क्राउन एस्टेट ने साफ इनकार कर दिया है। रेस्तरां ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है, पर सवाल सिर्फ एक इमारत का नहीं, बल्कि प्रवासी इतिहास, सांस्कृतिक धरोहर और रियल एस्टेट की निर्दयी ताकत का है।

वीरास्वामी की स्थापना 1926 में एडवर्ड पामर ने की थी। यह वही दौर था जब अंग्रेज भारत पर राज करते थे और लंदन में भारतीय खाने का मतलब करी पाउडर तक सीमित था। पामर ने असली भारतीय स्वाद - समोसा, डोसा, विंदालू और मद्रास करी - लंदनवासियों की थाली में परोसा। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी, चार्ली चैपलिन, मार्लन ब्रैंडो और प्रिंस चार्ल्स तक यहां भोजन कर चुके हैं। यह रेस्तरां भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का भी गवाह रहा। लंदन में पढ़ने वाले भारतीय छात्र, नेता और पत्रकार यहां इकट्ठा होते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान राशन व्यवस्था के बावजूद वीरास्वामी ने भारतीय सैनिकों को भोजन कराया। 100 वर्षों में इसने ब्रिटेन में भारतीय भोजन को टेकअवे से फाइन डाइनिंग तक पहुंचाया। आज लंदन में 10,000 से अधिक भारतीय रेस्तरां हैं। इस क्रांति की नींव वीरास्वामी ने रखी थी।

वीरास्वामी जिस इमारत में संचालित होता है, उसका मालिक क्राउन एस्टेट है। यह ब्रिटेन की एक बड़ी सरकारी संपत्ति संस्था है, जो राजा या रानी के नाम पर संचालित होती है। इसकी संपत्ति से होने वाला मुनाफा ब्रिटिश राजकोष में जाता है। अब क्राउन एस्टेट वीरास्वामी की इमारत में बदलाव और नया निर्माण करना चाहता है। इसी वजह से उसने रेस्तरां का किराये का समझौता आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया है। रेस्तरां का कहना है कि यदि लीज नहीं बढ़ाई गई तो उसे 100 साल पुरानी अपनी जगह छोड़नी पड़ेगी। लीज समाप्त हुए 15 महीने हो चुके हैं। क्राउन एस्टेट लंदन के सबसे महंगे इलाके रीजेंट स्ट्रीट को और प्रीमियम बनाना चाहता है। यहां लग्जरी ब्रांड, हाई-एंड ऑफिस और महंगे अपार्टमेंट की मांग है। एक पुराना भारतीय रेस्तरां, भले ही ऐतिहासिक हो, उनके पुनर्विकास की योजना में फिट नहीं बैठता।

वीरास्वामी ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी है। ब्रिटेन में सूचीबद्ध इमारतों और हेरिटेज स्थलों को संरक्षण मिलता है, परंतु वीरास्वामी एक इमारत नहीं, बल्कि एक व्यवसाय है। भवन क्राउन एस्टेट का है, इसलिए कानूनी पेंच फंसता है। 1954 के लैंडलॉर्ड एंड टेनेंट एक्ट के तहत व्यापारिक किरायेदार को लीज नवीनीकरण का अधिकार है, बशर्ते मकान मालिक के पास पुनर्विकास का मजबूत आधार न हो। क्राउन एस्टेट का तर्क है कि वह पूरी इमारत का पुनर्विकास करेगा, जिससे अधिक रोजगार और राजस्व आएगा। पर सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब सिर्फ नई इमारतें हैं? क्या 100 साल पुरानी सांस्कृतिक संस्था को उखाड़कर लग्जरी स्टोर बनाना ही प्रगति है? लंदन के मेयर सादिक खान और कई सांसद रेस्तरां के समर्थन में आ चुके हैं। 'सेव वीरास्वामी' अभियान चल रहा है और 50,000 से अधिक लोग याचिका पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।

वीरास्वामी का मामला अकेला नहीं है। न्यूयॉर्क का पाकिस्तान टी हाउस, पेरिस का सरवणा भवन और टोरंटो का गांधी रोटी जैसे प्रवासी संस्थान दुनिया भर में जेंट्रीफिकेशन का शिकार हो रहे हैं। मकान मालिक किराया बढ़ाते हैं, लीज खत्म करते हैं और शहर ग्लोबल बनने की दौड़ में अपनी स्थानीय पहचान खोते जा रहे हैं। ब्रिटेन में भारतीय भोजन सबसे लोकप्रिय विदेशी व्यंजन है। चिकन टिक्का मसाला को ब्रिटेन का राष्ट्रीय व्यंजन कहा जाता है। पर विडंबना देखिए कि उसी व्यंजन को ब्रिटेन से परिचित कराने वाला रेस्तरां अब बेघर होने की कगार पर है। यह सिर्फ व्यापार का नहीं, बल्कि पहचान का संकट है। वीरास्वामी बंद हुआ तो ब्रिटेन और भारत के साझा इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी समाप्त हो जाएगा, रास्ता क्या है?

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