दुनिया की राजनीति में कई बार फैसले ताकत के दम पर नहीं, बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी में लिए जाते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच सामने आया नया समझौता भी कुछ ऐसा ही संकेत देता है। जिस डोनाल्ड ट्रंप ने 2015 में बराक ओबामा के परमाणु समझौते को अमेरिका के इतिहास का सबसे खराब समझौता बताया था, वही आज ईरान के साथ फिर बातचीत और समझौते के रास्ते पर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बीच दुनिया ने युद्ध देखा, अरबों डॉलर खर्च हुए, तेल बाजार हिल गया और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ओबामा का समझौता तोड़कर और युद्ध का रास्ता अपनाकर अमेरिका को मिला क्या?
2015 में ओबामा प्रशासन ने ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन के साथ मिलकर ईरान के साथ परमाणु समझौता किया था। इस समझौते में ईरान को केवल सीमित स्तर तक यूरेनियम संवर्धन की अनुमति थी। उसके संवर्धित यूरेनियम के भंडार की सीमा तय कर दी गई थी और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को उसके परमाणु ठिकानों की नियमित जांच का अधिकार मिला था। बदले में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध धीरे-धीरे हटाए जाने थे। उस समय दुनिया ने इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम माना था।
लेकिन ट्रंप इस समझौते से संतुष्ट नहीं थे। उनका तर्क था कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर कोई रोक नहीं है, समझौते की समय सीमा सीमित है और प्रतिबंध हटने से ईरान को आर्थिक ताकत मिलेगी, जिसका इस्तेमाल वह अपने क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने में करेगा। इसी सोच के कारण उन्होंने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया और ईरान पर पहले से कहीं ज्यादा कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।
ट्रंप का मानना था कि अधिक दबाव डालकर ईरान से ज्यादा सख्त शर्तें मनवाई जा सकती हैं। लेकिन बीते वर्षों की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि केवल आर्थिक प्रतिबंध किसी देश की नीति नहीं बदल सकते। उलटे तनाव बढ़ा, टकराव गहरा हुआ और अंततः युद्ध की स्थिति बन गई। अब जब नया प्रारंभिक समझौता सामने आया है तो उसमें कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अभी भी स्पष्टता नहीं है।
ओबामा के समझौते में यूरेनियम संवर्धन की सीमा तय थी, परमाणु सामग्री के भंडार पर नियंत्रण था और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण की मजबूत व्यवस्था थी। इसके विपरीत मौजूदा प्रारंभिक समझौते में ईरान ने केवल परमाणु हथियार नहीं बनाने की बात दोहराई है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन कितना होगा, निरीक्षण कैसे होगा और परमाणु सामग्री का भंडार कितना रहेगा, इन अहम सवालों को आगे की बातचीत पर छोड़ दिया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों पर भी कोई स्पष्ट और कठोर शर्त अभी सामने नहीं आई है, जबकि ट्रंप प्रशासन इन्हें हमेशा सबसे बड़ा खतरा बताता रहा है।
इसके विपरीत नए समझौते में आर्थिक रियायतों पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने, उसकी रुकी हुई संपत्तियां उपलब्ध कराने और उसके पुनर्निर्माण के लिए बड़े निवेश की बात की जा रही है। यही कारण है कि कई विश्लेषक मान रहे हैं कि यदि अंतिम समझौते में परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलों पर पहले से ज्यादा कड़ी शर्तें नहीं जुड़तीं तो यह कहना मुश्किल होगा कि ट्रंप का समझौता ओबामा के समझौते से बेहतर है।
इस पूरे घटनाक्रम में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे बड़ा मोड़ बनकर उभरा। दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। जब यहां संकट पैदा हुआ तो तेल की कीमतों में तेजी आ गई, समुद्री बीमा महंगा हो गया और वैश्विक बाजारों में घबराहट फैल गई। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा असर पड़ा। इससे यह भी साबित हुआ कि पश्चिम एशिया में स्थिरता केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक जरूरत है।
युद्ध की कीमत भी कम नहीं रही। विभिन्न शुरुआती आकलनों के अनुसार अमेरिका को इस सैन्य अभियान पर प्रत्यक्ष रूप से दर्जनों अरब डॉलर खर्च करने पड़े और रक्षा बजट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा। दूसरी ओर तेल की बढ़ती कीमतों, समुद्री व्यापार में रुकावट, बीमा लागत में वृद्धि और निवेशकों की अनिश्चितता के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर का झटका लग सकता था। युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान हमेशा आम लोगों को होता है और इस बार भी वही हुआ।
यहीं ट्रंप की नीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जिस समझौते को उन्होंने कमजोर बताकर खत्म किया, उसके बाद अमेरिका ने वर्षों तक प्रतिबंध लगाए, सैन्य अभियान चलाया और अरबों डॉलर खर्च किए। अंत में उसे फिर बातचीत, प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक सहयोग के रास्ते पर लौटना पड़ा। यदि अंतिम समझौते में यूरेनियम संवर्धन, अंतरराष्ट्रीय निगरानी, लंबी दूरी की मिसाइलों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पहले से ज्यादा मजबूत प्रावधान नहीं बनते तो इतिहास यह सवाल जरूर पूछेगा कि ओबामा के समझौते को खत्म करके अमेरिका ने वास्तव में क्या हासिल किया।
भारत के लिए भी यह पूरा घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है। यदि क्षेत्र में शांति रहती है तो तेल की कीमतें नियंत्रित रहेंगी, महंगाई कम होगी और आर्थिक विकास को गति मिलेगी। लेकिन यदि तनाव फिर बढ़ा तो इसका असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है कि वहां स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। परिस्थितियां बदलती हैं तो नीतियां भी बदल जाती हैं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही नई पहल इसी सच्चाई का प्रमाण है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं देता। यदि अंत में बातचीत की मेज पर ही लौटना पड़ता है तो यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि बीच का संघर्ष, आर्थिक नुकसान और हजारों करोड़ डॉलर का खर्च आखिर किसलिए था।
आज दुनिया महंगाई, आर्थिक अनिश्चितता और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में किसी भी युद्ध की कीमत केवल सैनिक नहीं चुकाते, बल्कि पूरी मानवता चुकाती है। इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच बनने वाला अंतिम समझौता केवल दो देशों के रिश्तों का दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि भविष्य की दुनिया टकराव के रास्ते पर चलेगी या संवाद और समझदारी के रास्ते पर। अगर इतिहास से सबक लिया गया तो शायद आने वाले समय में हथियारों की जगह बातचीत ज्यादा मजबूत साबित होगी।


















