कोलकाता, 20 जून।
पश्चिम बंगाल में सरकारी आवासों में स्मार्ट बिजली मीटर लगाने के राज्य सरकार के हालिया निर्देश ने एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। सरकारी कर्मचारी समन्वय समिति ने इस अनिवार्य प्रक्रिया को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिसके बाद न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा की एकल पीठ में 23 जून को मामले की पहली सुनवाई सुनिश्चित की गई है।
राज्य सरकार ने सभी सरकारी विभागों, निगमों और अनुदान प्राप्त संस्थानों को अपने कर्मचारियों के घरों में स्मार्ट मीटर की स्थापना प्रक्रिया को तत्काल तेज करने का आदेश दिया था। इस सरकारी आदेश को वाम समर्थित कर्मचारी संगठनों ने सरकारी कर्मचारियों की निजता और उनके अधिकारों का सीधा उल्लंघन करार दिया है। उच्च न्यायालय की कार्यसूची में इस नई याचिका को शामिल कर लिया गया है, जिसमें याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सागरिका गोस्वामी कानूनी पक्ष रखेंगी।
याचिकाकर्ता संगठन के नेता विश्वजीत गुप्त चौधरी ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे दोहरा मानदंड करार दिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अतीत में जब वर्तमान मुख्यमंत्री विपक्ष में थीं, तब उन्होंने स्मार्ट मीटर के मुद्दे का कड़ा विरोध किया था, लेकिन आज सत्ता में आने के बाद सरकारी कर्मचारियों पर यही निर्णय जबरन थोपा जा रहा है। उन्होंने जोर दिया कि राज्य के कर्मचारी पहले से ही अपने महंगाई भत्ते और कई अन्य लंबित मांगों के समाधान के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में प्रशासन का यह नया निर्देश उनके असंतोष को और अधिक बढ़ा रहा है।
इस विरोध में बंगीय शिक्षक एवं शिक्षाकर्मी समिति के नेता स्वपन मंडल भी शामिल हो गए हैं, जिन्होंने इस निर्णय को पूरी तरह अनुचित और थोपा हुआ बताया है। उन्होंने तर्क दिया है कि यदि स्मार्ट मीटर की तकनीक वास्तव में आम जनता के लिए इतनी ही हितकारी और लाभकारी होती, तो इसे लागू करने के लिए किसी दबाव की आवश्यकता नहीं पड़ती और लोग इसे स्वेच्छा से स्वीकार कर लेते। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह गुहार लगाई है कि वह राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों को कानून के दायरे में रहकर कार्य करने और जनहित की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें।


















