जोधपुर, 20 जून।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर प्रसारित एक विवादास्पद खबर के आधार पर बिना किसी निष्पक्ष जांच के खाद्य सुरक्षा अधिकारी को सेवामुक्त करने के सरकारी आदेश पर बड़ी राहत देते हुए रोक लगा दी है। जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की अवकाशकालीन एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए जिला कलेक्टर, प्रतापगढ़ और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर इस संबंध में जवाब मांगा है।
याचिकाकर्ता सुनील कुमार पामेचा, जो प्रतापगढ़ में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्यरत थे, ने अपने अधिवक्ता यशपाल खिलेरी के माध्यम से उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सेवामुक्ति को चुनौती दी थी। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 2022 में विधिवत प्रशिक्षण के बाद हुई थी और वे अपनी सेवाएं पूरी ईमानदारी से दे रहे थे। याचिका के अनुसार, 4 जून 2026 को ग्राम घंटाली एवं अरनोद में किए गए सघन निरीक्षण से स्थानीय दुकानदारों में हड़कंप मच गया था। इसी आक्रोश में स्थानीय सरपंच कचरुलाल निनामा ने सोशल मीडिया पर याचिकाकर्ता पर अवैध वसूली के झूठे आरोप लगाते हुए खबर वायरल कर दी।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि जिला कलेक्टर ने सोशल मीडिया पर वायरल हुई खबर को ही अंतिम सत्य मान लिया और बिना किसी तथ्यात्मक जांच के उन्हें अगले ही दिन सेवामुक्त करने का आदेश जारी कर दिया। याचिका में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि जिला कलेक्टर न तो याचिकाकर्ता के नियुक्ति प्राधिकारी हैं और न ही उनके पास उन्हें सेवामुक्त करने का कानूनी अधिकार है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
अधिवक्ता खिलेरी ने अदालत में तर्क दिया कि किसी भी कर्मचारी पर दुराचार का आरोप लगाकर उसे सेवा से हटाना एक गंभीर प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके लिए तथ्यपरख जांच अनिवार्य है। बिना नियमानुसार जांच और लिखित नोटिस के की गई यह कार्रवाई पूर्णतः असंवैधानिक और विधिविरुद्ध है। उच्च न्यायालय ने इन तथ्यों पर गौर करते हुए याचिकाकर्ता की सेवामुक्ति के आदेशों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अब मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी।


















