संपादकीय
02 Jul, 2026

मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में अंदरूनी कलह

मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल संगठनात्मक असंतोष, नेतृत्व संबंधी चुनौतियों और गुटीय राजनीति के बीच नए राजनीतिक समीकरणों का सामना कर रहे हैं।

भोपाल, 02 जुलाई।

मध्यप्रदेश की सियासत में 'अंदरूनी कलह' कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में यह अंतर्विरोध एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। सत्ता पक्ष (भाजपा) जहां संगठन में भारी विस्तार और बाहरी नेताओं के आगमन के बाद 'मूल बनाम आयातित' कार्यकर्ताओं की लड़ाई से जूझ रहा है, वहीं विपक्ष (कांग्रेस) लगातार हार के बाद नेतृत्व संकट, गुटबाजी और वजूद बचाए रखने के आंतरिक संघर्ष से गुजर रहा है।

मध्यप्रदेश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में दोनों प्रमुख दलों की अंदरूनी कलह, उसके कारणों और उसके दूरगामी प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण करना जरूरी है।

भाजपा अपनी मजबूत सांगठनिक संरचना और कड़े अनुशासन के लिए जानी जाती है। हालांकि, 2020 के तख्तापलट (सिंधिया के दलबदल) और 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद भारी बहुमत से सत्ता में लौटने के बावजूद, पार्टी के भीतर असंतोष की सुगबुगाहट लगातार तेज हुई है।

भाजपा की अंतर्कलह का सबसे बड़ा कारण पार्टी का अत्यधिक विस्तार है। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आए कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान मिला। इसके बाद 2023-24 के दौरान भी 'जॉइनिंग टोली' के माध्यम से हजारों विपक्षी नेताओं को भाजपा में शामिल किया गया।

दशकों से भाजपा की विचारधारा के लिए जमीन पर लाठियां खाने वाले मूल कार्यकर्ता अब खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। कई क्षेत्रों में पुराने भाजपा नेताओं और नए आए 'कांग्रेसी पृष्ठभूमि' के नेताओं के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई है।

शिवराज सिंह चौहान के केंद्रीय राजनीति में जाने और डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद मध्यप्रदेश भाजपा में एक बड़े युग का परिवर्तन हुआ। मोहन यादव सरकार और नए प्रदेश नेतृत्व के आने से कई स्थापित और वरिष्ठ क्षत्रप, जैसे गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह और बिसाहूलाल सिंह, हाशिए पर चले गए हैं या उनकी भूमिकाएं सीमित हो गई हैं।

यह असंतोष खुलकर बगावत का रूप तो नहीं ले पाता, शायद अनुशासन के डर से, लेकिन समय-समय पर नेताओं के बयानों और प्रशासनिक ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर नाराजगी के रूप में सामने आता रहता है।

अक्सर भाजपा विधायक और जिला स्तर के नेता यह शिकायत करते हैं कि सरकार में 'अफसरशाही' हावी है और जनप्रतिनिधियों की सुनवाई नहीं हो रही है। जब कार्यकर्ताओं के काम नहीं होते, तो वे अपनी ही सरकार के खिलाफ असंतोष व्यक्त करने लगते हैं, जो सोशल मीडिया या बंद कमरों की बैठकों में कलह के रूप में दिखाई देता है।

अब यदि कांग्रेस की बात करें तो प्रदेश में अंदरूनी कलह एक लाइलाज बीमारी की तरह उभर आई है। 2018 में सत्ता में आने के बाद भी आपसी खींचतान तीन नेताओं—कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया—के बीच रही और उसी के कारण सरकार गिर गई थी। वैसे आज भी स्थिति बहुत ज्यादा नहीं बदली है।

विधानसभा और लोकसभा चुनावों में करारी शिकस्त के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने कमलनाथ को हटाकर जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष और उमंग सिंघार को नेता प्रतिपक्ष बनाया। यह बदलाव युवाओं को आगे लाने के लिए किया गया था, लेकिन इसने आंतरिक कलह को और हवा दे दी।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के समर्थक गुट पूरी तरह से नए नेतृत्व का सहयोग नहीं कर रहे हैं। कई वरिष्ठ नेता जीतू पटवारी की कार्यशैली पर सार्वजनिक रूप से या बंद कमरों में सवाल उठा चुके हैं।

लगातार हार से टूट चुके कार्यकर्ताओं में भारी निराशा है। जब बड़े नेता, जैसे सुरेश पचौरी, दीपक जोशी और रामनिवास रावत, पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होते हैं, तो नीचे का संगठन बिखर जाता है। बचे हुए नेताओं में इस बात की होड़ मची रहती है कि पार्टी पर कब्जा किसका रहेगा, बजाय इसके कि भाजपा से कैसे लड़ा जाए।

कांग्रेस में चुनाव के दौरान टिकट वितरण को लेकर होने वाली कलह सड़कों पर आ जाती है। अनुशासन समिति होने के बावजूद नेताओं द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी आम बात है। गुटबाजी का आलम यह है कि एक गुट का नेता दूसरे गुट के उम्मीदवार को हराने के लिए 'भीतरघात' करने से भी गुरेज नहीं करता।

दोनों दलों की कलह में मुख्य अंतर यह है कि भाजपा में कलह का कारण अत्यधिक सत्ता, भारी विस्तार और नए चेहरों का आगमन है, जबकि कांग्रेस में लगातार हार, नेतृत्व का अभाव और पुरानी गुटबाजी प्रमुख कारण हैं। भाजपा में असंतोष बंद कमरों में, इशारों में या प्रशासनिक खींचतान के रूप में दिखाई देता है, जबकि कांग्रेस में यह सड़कों पर, सार्वजनिक बयानों और इस्तीफों के रूप में सामने आता है।

जब सत्ताधारी दल के भीतर मंत्रियों और विधायकों में खींचतान होती है, तो इसका सीधा असर प्रशासनिक फैसलों पर पड़ता है। ट्रांसफर उद्योग और मनपसंद अधिकारियों की नियुक्ति की होड़ में जनता की भलाई से जुड़े मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

कांग्रेस की आंतरिक कलह का सबसे बड़ा नुकसान राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था को हो रहा है। एक मजबूत विपक्ष के अभाव में सरकार पर नियंत्रण कमजोर होता है। जनता के मुद्दों, जैसे बेरोजगारी, किसान उत्थान और कानून-व्यवस्था, पर सड़क पर उतरने के बजाय कांग्रेस नेता आपस में ही उलझे रहते हैं।

मतदाताओं में भ्रम

जनता जब दोनों ही दलों में सिरफुटव्वल देखती है, तो उसका राजनीतिक शुचिता पर भरोसा उठने लगता है। दलबदल और आंतरिक गुटबाजी के कारण मतदाता खुद को ठगा हुआ महसूस करता है कि उसने जिस विचारधारा को वोट दिया था, वह नेता अब पाला बदल चुका है।

प्रदेश की राजनीति इस समय एक संक्रमण काल से गुजर रही है। भाजपा के लिए चुनौती अपनी वैचारिक शुद्धता को बचाते हुए इस विशालकाय संगठन को अनुशासित बनाए रखने की है। यदि भाजपा ने अपने मूल कार्यकर्ताओं के असंतोष को समय रहते शांत नहीं किया, तो आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और अन्य चुनावों में उसे अपनों से ही कड़ी चुनौती मिल सकती है।

दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए यह 'करो या मरो' की स्थिति है। कांग्रेस की कलह वैचारिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की है। जब तक कांग्रेस के बड़े नेता अपने अहं को छोड़कर सामूहिक नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता नहीं देंगे, तक तक पार्टी का इस अंतर्कलह से उबरना नामुमकिन है।

दोनों दलों की यह अंदरूनी कलह ही आने वाले समय में मध्यप्रदेश का नया राजनीतिक भविष्य तय करेगी।

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आज का राशिफल

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