नई दिल्ली, 02 जुलाई।
एसआईआर पर कांग्रेस का अलर्ट बताता है कि अब चुनाव बूथ पर लड़े जाएंगे। बड़े भाषण और वादे अपनी जगह हैं, पर जीत-हार का फैसला कुछ हजार वोट तय करेंगे। कर्नाटक से तेलंगाना और दिल्ली से पंजाब तक एक-एक वोट की कीमत बढ़ गई है। कांग्रेस ने यदि बूथ स्तर की लड़ाई जीत ली, तो सत्ता की राह आसान हो सकती है, वरना मामूली चूक भारी पड़ सकती है। आने वाले दिन तय करेंगे कि मतदाता सूची की जंग में कौन बाजी मारता है और लोकतंत्र का यह सबसे बुनियादी दस्तावेज कितना मजबूत बनता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस ने अपनी चुनावी रणनीति पूरी तरह बदल दी है। पार्टी अब बूथ स्तर तक उतरकर एक-एक वोट बचाने की कवायद में जुट गई है। तीसरे चरण में शामिल कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब, दिल्ली, झारखंड, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा समेत उत्तर-पूर्व के राज्यों में कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण अभियान शुरू हो गया है। कांग्रेस का मानना है कि करीबी मुकाबलों में कुछ हजार वोट भी नतीजा बदल सकते हैं। इसलिए मतदाता सूची के हर दावे और हर आपत्ति पर अब पार्टी की सीधी निगरानी रहेगी।
पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस को चौकन्ना कर रहे हैं। कर्नाटक में 2023 के विधानसभा चुनाव में 224 में से 41 सीटों पर जीत-हार का अंतर पांच हजार वोट से कम रहा। यह कुल सीटों का करीब 18 प्रतिशत है। वहीं, तेलंगाना में 119 में से करीब 20 सीटों पर अंतर पांच हजार वोट से कम था। इनमें कई सीटों पर अंतर एक हजार वोट से भी कम रहा। पंजाब, दिल्ली और हरियाणा में भी कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहा है। पार्टी का आकलन है कि यदि इतने ही नाम सूची से हट जाएं या प्रभावित हो जाएं, तो चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा। इसलिए अब रणनीति का केंद्र बूथ बन गया है।
चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चला रहा है। इसमें मतदाता सूची से फर्जी नाम हटाने, नए मतदाताओं को जोड़ने और पते में बदलाव करने का काम होता है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में चुनिंदा इलाकों में बड़े पैमाने पर नाम काटे जा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि गरीब, दलित, अल्पसंख्यक और प्रवासी मतदाताओं के नाम हटने का खतरा ज्यादा है। इसी आशंका को देखते हुए पार्टी ने हर बूथ पर नजर रखने का फैसला किया है।
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बेंगलुरु में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया और साफ कहा कि जिन सीटों पर जीत-हार का अंतर चार-पांच हजार वोट का होता है, वहां एक-एक नाम कीमती है। प्रशिक्षण में कार्यकर्ताओं को बताया जा रहा है कि मतदाता सूची कैसे जांचें, दावा-आपत्ति का फॉर्म कैसे भरें, बीएलओ से कैसे समन्वय बनाएं और चुनाव आयोग के पोर्टल पर ऑनलाइन आपत्ति कैसे दर्ज करें। हर विधानसभा क्षेत्र में लीगल टीम बनाई गई है, जो जरूरत पड़ने पर तुरंत याचिका दाखिल करेगी।
प्रदेश इकाइयों को निर्देश दिए गए हैं कि एसआईआर के दौरान आने वाले प्रत्येक दावे और आपत्तियों पर नजर रखें और जरूरत पड़ने पर तुरंत कानूनी तथा चुनाव आयोग के स्तर पर कार्रवाई करें। कांग्रेस हर बूथ पर मतदाता सूची का मिलान, नए मतदाताओं के पंजीकरण और नाम हटने की शिकायतों की निगरानी की व्यवस्था पर काम कर रही है। बूथ-लेवल एजेंटों को मतदाता सूची की हार्ड कॉपी दी जा रही है, ताकि घर-घर सत्यापन हो सके। व्हाट्सऐप ग्रुप बनाकर पल-पल की जानकारी साझा की जा रही है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कांग्रेस नेताओं को पहले ही चेतावनी दे दी है। उन्होंने कहा है कि यदि वे एसआईआर अभियान को लेकर पार्टी के निर्देशों का पालन नहीं करेंगे, तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने दोटूक कहा कि यदि पार्टी को नुकसान हुआ, तो वह मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेंगे। रेवंत रेड्डी का यह बयान कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भर रहा है और स्थानीय नेताओं को सक्रिय कर रहा है।
कर्नाटक में 41 सीटों पर पांच हजार से कम का अंतर बताता है कि बूथ स्तर पर मामूली चूक भी सरकार बदल सकती है। इसी तरह तेलंगाना में 20 सीटों पर करीबी मुकाबला रहा है। कांग्रेस की रणनीति है कि इन सीटों पर विशेष फोकस रखा जाए। इन क्षेत्रों में मतदाता सूची का शत-प्रतिशत सत्यापन कराया जाएगा। नए मतदाता, खासकर 18 से 19 साल के युवाओं को जोड़ने का अभियान चलेगा। कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में शिविर लगाए जाएंगे।
दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में पिछले चुनाव में तीन सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहा था। पंजाब में ग्रामीण सीटों पर प्रवासी मजदूरों के नाम मतदाता सूची से हटने की शिकायतें रही हैं। हरियाणा में जाट बहुल सीटों पर वोटों का बंटवारा नतीजा तय करता है। इन राज्यों में कांग्रेस ने बूथ कमेटियों को सक्रिय कर दिया है। हर बूथ पर पांच सदस्यीय टीम बनाई गई है, जिसमें महिला, युवा और अल्पसंख्यक प्रतिनिधि शामिल हैं।
भाजपा का कहना है कि कांग्रेस एसआईआर के बहाने फर्जी मतदाताओं को बचाना चाहती है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में हैं और एसआईआर से वे हटेंगे, तो कांग्रेस को नुकसान होगा। भाजपा ने भी अपने कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर पर सक्रिय रहने को कहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में मतदाता सूची को लेकर सियासी टकराव और बढ़ सकता है।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि एसआईआर का उद्देश्य स्वच्छ और त्रुटिहीन मतदाता सूची बनाना है। आयोग ने कहा है कि किसी भी वैध मतदाता का नाम नहीं कटेगा और सभी दावों-आपत्तियों का निपटारा पारदर्शी तरीके से होगा। आयोग ने राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे बीएलओ का सहयोग करें और अफवाह न फैलाएं। फिर भी मैदान में उतरी पार्टियां कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं। सबसे बड़ी चुनौती समय की कमी है। एसआईआर की अंतिम तिथि नजदीक है और लाखों नामों का सत्यापन बाकी है। ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क की समस्या है और कई जगह बीएलओ समय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। कांग्रेस के सामने दोहरी परीक्षा है। एक तरफ कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना है, दूसरी तरफ मतदाताओं को जागरूक करना है कि वे स्वयं भी मतदाता सूची में अपना नाम जांच लें।
















