संपादकीय
03 Jul, 2026

माफी के मोहरे, विश्वास का खड़ा होता संकट: माफी वीर राजनीति के वीर नहीं हो सकते

राहुल गांधी से जुड़े लगातार सामने आ रहे माफी और मानहानि मामलों ने उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता तथा सार्वजनिक वक्तव्यों को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है।

भोपाल, 3 जुलाई।

राज्य-दर-राज्य अदालतों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी द्वारा माफी मांगने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। इस बार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय सिंह चौहान से माफी मांगी है। मामला 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान झाबुआ की एक सभा में दिए गए उनके भाषण से जुड़ा है। पनामा पेपर लीक का उल्लेख करते हुए राहुल गांधी ने कार्तिकेय का नाम लिया था। इसके बाद कार्तिकेय ने मानहानि का मुकदमा दायर किया। अब राहुल गांधी ने अदालत में कहा है कि उनकी टिप्पणी का कार्तिकेय से कोई संबंध नहीं था।

सार्वजनिक जीवन में किसी भी नेता पर बार-बार मानहानि के मुकदमे होना उसकी राजनीतिक परिपक्वता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। राहुल गांधी के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, वीर सावरकर और अन्य मामलों में भी मानहानि के प्रकरण अदालतों में विचाराधीन हैं। मोदी समाज पर की गई टिप्पणी के मामले में उन्हें सजा भी मिली थी, जिसके कारण उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त हुई और बाद में सर्वोच्च न्यायालय से राहत मिलने पर बहाल हुई। यदि कोई गलती बार-बार दोहराई जाए, तो वह आदत बन जाती है।

राफेल मामले में 'चौकीदार चोर है' अभियान के दौरान राहुल गांधी ने यह तक कह दिया था कि सुप्रीम कोर्ट ने भी यही माना है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने आपत्ति जताई और उन्हें माफी मांगनी पड़ी। जो व्यक्ति देश का नेतृत्व करना चाहता है, उसे अपने शब्दों के प्रति सबसे अधिक सावधान रहना चाहिए। यदि अनजाने में भी कोई गलती हो जाए, तो उसे तुरंत स्वीकार कर विवाद समाप्त करना ही परिपक्व राजनीति का परिचायक होता है।

संसद में उनके कई भाषण विवादों का कारण बने हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना जैसे संवेदनशील विषयों पर भी उनके बयान चर्चा और विवाद दोनों पैदा करते रहे हैं। जिस कांग्रेस का वे नेतृत्व कर रहे हैं, उसकी देश की स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी गौरवशाली विरासत रही है। ऐसे में किसी पर तथ्यहीन आरोप लगाना उसी विरासत की गरिमा को भी प्रभावित करता है।

राहुल गांधी को सक्रिय राजनीति में दो दशक से अधिक समय हो चुका है। इसके बावजूद उनके अनेक बयान यह संकेत देते हैं कि तथ्यों की पुष्टि से अधिक प्राथमिकता राजनीतिक सुर्खियों को दी जाती है। किसी भी नेता की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है। जिस प्रकार बिना क्रेडिट स्कोर के बैंक ऋण नहीं देता, उसी प्रकार बिना विश्वास के जनता भी नेतृत्व स्वीकार नहीं करती।

लोकतंत्र में विपक्ष का धर्म केवल विरोध करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और तथ्यपूर्ण विकल्प प्रस्तुत करना भी है। यदि शीर्ष नेतृत्व बिना पर्याप्त तथ्यों के आरोप लगाएगा, तो उसका संदेश कार्यकर्ताओं तक भी जाएगा। भाषण में संयम, तथ्य और मर्यादा हो, तो माफी मांगने की नौबत ही नहीं आती। देश को मजबूत विपक्ष की आवश्यकता है, लेकिन वह उतना ही जिम्मेदार भी होना चाहिए। जब तक राहुल गांधी अपनी भाषा, तथ्यों और राजनीतिक गंभीरता पर नियंत्रण नहीं करेंगे, तब तक माफी का सिलसिला और राजनीतिक विश्वसनीयता पर उठते सवाल दोनों बने रहेंगे।

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