भोपाल, 3 जुलाई।
मध्य प्रदेश में अफसरों और कर्मचारियों को प्रमोशन का इंतजार करते लगभग एक दशक बीत चुका है। अब मोहन सरकार ने प्रमोशन का रास्ता खोलने की दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने सभी विभागों को विधिक परामर्श के अनुसार कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, प्रमोशन का मामला अब भी प्रमोशन पॉलिसी के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं पर अदालत के अंतिम फैसले पर टिका हुआ है। यदि सरकार अदालत के निर्णय के अधीन सशर्त प्रमोशन करना चाहती थी, तो यह काम पहले भी किया जा सकता था।
उन अफसरों और कर्मचारियों का क्या दोष है, जो सरकार की प्रमोशन पॉलिसी पर अदालत के निर्णय के इंतजार में बिना प्रमोशन ही सेवानिवृत्त हो गए? प्रमोशन पॉलिसी को पहली बार हाई कोर्ट ने 2016 में निरस्त किया था। उस समय शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे। 2018 के विधानसभा चुनाव में उनकी सरकार पराजित हुई। इस पराजय के पीछे अन्य कारणों के साथ कर्मचारियों में उपजा आक्रोश भी एक कारण माना गया। इसके बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार भी प्रमोशन पर कोई निर्णय नहीं ले सकी। कांग्रेस सरकार गिरने के बाद शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन तब भी राज्य के कर्मचारियों के प्रमोशन पर कोई निर्णय नहीं हो सका। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को इस बात का श्रेय अवश्य मिलेगा कि उनकी सरकार ने मध्य प्रदेश पदोन्नति नियम, 2025 अधिसूचित किए। इन नए नियमों को भी हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। नए नियमों पर हाई कोर्ट ने कोई स्थगन आदेश नहीं दिया, लेकिन सरकार ने स्वयं अदालत में यह अंडरटेकिंग दी कि याचिकाओं पर फैसला आने तक प्रमोशन की कार्रवाई नहीं की जाएगी। परिणामस्वरूप, नई प्रमोशन पॉलिसी बनने के बाद भी राज्य सरकार के अधिकारी और कर्मचारी अब तक प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं।
प्रमोशन से संबंधित याचिकाओं पर अदालत में हुई कार्रवाई भी अब एक विचित्र स्थिति में पहुंच गई है। मध्य प्रदेश सरकार ने महाधिवक्ता तथा प्रमोशन पॉलिसी के खिलाफ दायर याचिकाओं में सरकार का पक्ष रखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता से विधिक परामर्श प्राप्त किया। इस परामर्श से यह स्पष्ट हुआ कि बिना किसी स्थगन आदेश के भी राज्य सरकार की अंडरटेकिंग के कारण प्रमोशन रुके हुए थे। हाई कोर्ट में याचिकाओं पर सुनवाई पूरी हो चुकी थी। राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं, दोनों का पक्ष सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। लेकिन जिस पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा था, उसके एक न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत हो गए और दूसरे न्यायाधीश का स्थानांतरण हो गया। परिणामस्वरूप सुरक्षित फैसला सुनाया नहीं जा सका। अब स्थिति यह है कि इन याचिकाओं की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट में नई पीठ गठित होगी और फिर से सुनवाई होगी। दो वर्ष पहले पूरी हो चुकी सुनवाई अब दोबारा शुरू होगी। नई पीठ की सुनवाई में कितना समय लगेगा, यह कहना कठिन है।
राज्य सरकार का ध्यान इस ओर गया और उसने अधिकारियों तथा कर्मचारियों के लंबे इंतजार को समाप्त करने के बारे में विचार किया। विधिक परामर्श में अनेक न्यायिक उद्धरणों के आधार पर यह राय दी गई कि प्रमोशन के लिए विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठकें आयोजित की जा सकती हैं और प्रमोशन आदेश भी जारी किए जा सकते हैं, लेकिन ये सभी आदेश हाई कोर्ट में लंबित रिट याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन होंगे। अर्थात यदि निर्णय पदोन्नति नियम, 2025 के विरुद्ध आता है, तो उसके अंतर्गत हुई सभी डीपीसी और जारी किए गए प्रमोशन आदेश स्वतः अमान्य हो जाएंगे। यानी अफसरों और कर्मचारियों के प्रमोशन के रास्ते में न्यायिक बाधा अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
जीएडी ने अपने परिपत्र में विभागों को स्पष्ट रूप से डीपीसी आयोजित करने के निर्देश नहीं दिए हैं। उसने पूरी जिम्मेदारी विभागाध्यक्षों और विभागीय सचिवों पर छोड़ दी है। परिपत्र में केवल इतना कहा गया है कि विधिक परामर्श के अनुसार कार्रवाई की जाए। जबकि विधिक परामर्श स्वयं यह कहता है कि रिट याचिकाओं पर अंतिम निर्णय के बाद ही पदोन्नति नियम, 2025 का भविष्य तय होगा।
अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रमोशन का इंतजार करते हुए लगभग एक दशक बीत गया है। इस न्यायिक बाधा का खामियाजा केवल राज्य सरकार के कैडर को भुगतना पड़ रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफएस) जैसे अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के प्रमोशन समय पर हो जाते हैं, जबकि राज्य सरकार के कर्मचारियों को इसके लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ रहा है। नई प्रमोशन पॉलिसी में 2016 के बाद सेवानिवृत्त हुए अधिकारियों और कर्मचारियों की भी अनदेखी की गई है। जबकि 2016 से ही प्रमोशन रुके हुए हैं और उस अवधि के दौरान वर्षवार डीपीसी होना विधिसम्मत प्रक्रिया थी। भले ही सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पदोन्नति का पद न मिले और नया वेतनमान भी न दिया जाए, लेकिन उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि पर वेतन का पुनर्निर्धारण होना चाहिए तथा उसी के अनुसार उनकी पेंशन तय की जानी चाहिए। जिन कर्मचारियों को समयमान या उच्च वेतनमान मिलने के कारण पेंशन में वित्तीय नुकसान नहीं हुआ, उनकी स्थिति अलग है, लेकिन जिन कर्मचारियों को समयमान या वेतनमान नहीं मिला और प्रमोशन भी नहीं हुआ, उनकी कम पेंशन से हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी?
राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रत्येक विभाग में हर वर्ष डीपीसी आयोजित हो और प्रत्येक पात्र अधिकारी तथा कर्मचारी को उसकी नियत तिथि पर प्रमोशन मिले। प्रमोशन केवल पदोन्नति नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा का सम्मान भी है। इससे कार्य के प्रति उत्साह और प्रतिबद्धता बढ़ती है। जो सरकारी व्यवस्था अपने ही अधिकारियों और कर्मचारियों को उनका वाजिब अधिकार समय पर नहीं दे सकती, उससे सुशासन की अपेक्षा करना कठिन है।
अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा वर्षों तक प्रमोशन का इंतजार करना एक प्रकार से प्रशासनिक दुर्व्यवहार कहा जा सकता है। वर्तमान सरकार इस बात के लिए अवश्य सराहना की पात्र है कि उसने नई प्रमोशन पॉलिसी बनाई। जब उस पॉलिसी पर हाई कोर्ट में मामला लंबा खिंचने लगा, तब विधिक परामर्श लेकर प्रमोशन की बाधा दूर करने का प्रयास भी किया।
वैसे भी सरकारी तंत्र नियमित कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है। राज्य सरकार स्वयं हाई कोर्ट में बता चुकी है कि केवल 40 प्रतिशत अमले के सहारे व्यवस्था चल रही है। लगातार सेवानिवृत्तियां हो रही हैं, नई भर्तियां नहीं हो रही हैं और प्रमोशन की स्थिति यह है कि कर्मचारी वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। बिना प्रमोशन के बीता यह दशक निश्चित रूप से पूरे सिस्टम के लिए एक सबक है। जितनी जल्दी रुके हुए प्रमोशन होंगे, उतना ही सरकार, प्रशासनिक व्यवस्था और जनहित—तीनों का भला होगा।
















