नई दिल्ली, 3 जुलाई।
दिल्ली सरकार ने ईवी पॉलिसी 2.0 को मंजूरी देकर बड़ा दांव खेला है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में तय किया गया कि 1 जुलाई से नई नीति लागू होगी। सरकार का लक्ष्य है कि 2027 तक राजधानी में पंजीकृत होने वाले 95 प्रतिशत नए वाहन इलेक्ट्रिक हों। चार वर्षों में 15,000 करोड़ रुपये का निवेश चार्जिंग नेटवर्क, स्क्रैपिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक परिवहन के विद्युतीकरण पर किया जाएगा। दावा है कि 31 मार्च 2030 तक प्रदूषण मुक्त दिल्ली का सपना साकार होगा। लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।
नई नीति के तहत 1 जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो का नया पंजीकरण होगा। नए सीएनजी ऑटो का पंजीकरण बंद कर दिया जाएगा। 1 अप्रैल 2028 से दोपहिया वाहनों का नया पंजीकरण भी केवल इलेक्ट्रिक श्रेणी में होगा। सरकार बस, टैक्सी और मालवाहक वाहनों को भी चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक बनाना चाहती है। चार्जिंग स्टेशन हर तीन किलोमीटर पर स्थापित करने और बैटरी अदला-बदली केंद्र खोलने का लक्ष्य रखा गया है।
दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती है। सर्दियों में पीएम 2.5 का स्तर कई बार 500 के पार पहुंच जाता है। वाहनों से होने वाला प्रदूषण इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। यदि यह नीति सफल होती है तो कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कणों का उत्सर्जन घटेगा। इससे जनस्वास्थ्य में सुधार होगा, अस्पतालों पर दबाव कम होगा और कार्य दिवसों की हानि भी घटेगी।
15,000 करोड़ रुपये का निवेश रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा। बैटरी निर्माण, चार्जर उत्पादन, वाहन असेंबली और रखरखाव के क्षेत्र में हजारों नौकरियां बनेंगी। कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी और उपभोक्ताओं का ईंधन खर्च कम होगा। इलेक्ट्रिक वाहनों की संचालन लागत पेट्रोल वाहनों की तुलना में काफी कम है, जिससे मध्यम वर्ग को सीधा लाभ मिल सकता है।
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की है। वर्तमान में दिल्ली में सार्वजनिक चार्जिंग पॉइंटों की संख्या लक्ष्य के मुकाबले बहुत कम है। ईवी चार्जिंग बढ़ने से बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा, इसलिए बिजली वितरण व्यवस्था को मजबूत करना होगा। दूसरी चुनौती लिथियम-आयन बैटरियों की ऊंची कीमत और उनके आयात पर निर्भरता है। बैटरी रीसाइक्लिंग की प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी होगी। तीसरी चुनौती उपभोक्ताओं की स्वीकार्यता है। सब्सिडी के बावजूद इलेक्ट्रिक वाहन अभी भी अपेक्षाकृत महंगे हैं।
नीति की सफलता पूरी तरह उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। सरकार को चार्जिंग हब का तेजी से विस्तार करना होगा, ईवी चार्जिंग के लिए रियायती बिजली दरें लागू करनी होंगी और स्क्रैपिंग प्रक्रिया को सरल बनाना होगा। साथ ही नागरिकों को भी सार्वजनिक परिवहन, साझा वाहन और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना होगा। यदि सरकार और जनता मिलकर प्रयास करें, तो प्रदूषण मुक्त दिल्ली का सपना साकार हो सकता है। अन्यथा यह महत्वाकांक्षी नीति भी केवल फाइलों तक सीमित रह जाएगी।
















