संपादकीय
03 Jul, 2026

एक थाना, 52 जिलों का बोझ; साइबर ठग बेखौफ

मध्यप्रदेश में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच पूरे प्रदेश की जांच व्यवस्था एक ही साइबर थाने पर निर्भर होने से कार्रवाई की गति और प्रभावशीलता दोनों चुनौती के सामने हैं।

भोपाल, 3 जुलाई।

मध्य प्रदेश में साइबर अपराध का ग्राफ हर दिन बढ़ रहा है, पर इससे लड़ने की जिम्मेदारी अकेले भोपाल के कंधों पर है। पूरे प्रदेश के 52 जिलों की डिजिटल जांच का बोझ भोपाल साइबर थाने पर है। नतीजा यह है कि ठग हर साल करीब 600 करोड़ रुपये की चपत लगा रहे हैं और आम आदमी की जेब खाली हो रही है। 52 जिलों का बोझ अगर एक थाने पर रहेगा, तो ठगों की मौज रहेगी और जनता लुटती रहेगी। साइबर अपराध अब हर घर तक पहुंच गया है और इससे लड़ने के लिए थाना भी हर जिले तक पहुंचाना होगा। स्टाफ, तकनीक और बजट की कमी दूर करनी होगी, वरना 'सेफ क्लिक' अभियान पोस्टर तक सिमट जाएगा और 600 करोड़ रुपये का आंकड़ा अगले साल 1,000 करोड़ रुपये हो जाएगा। भोपाल को नोडल सेंटर बनाया जा सकता है, पर हर जिले को लड़ाकू बनाना ही असली समाधान है। जब तक जिला स्तर पर साइबर थाना, प्रशिक्षित बल और फोरेंसिक लैब नहीं होगी, तब तक साइबर ठगों पर लगाम लगाना मुश्किल है। अब फैसला शासन को करना है कि फाइल आगे बढ़ेगी या जनता की गाढ़ी कमाई यूं ही लुटती रहेगी।

जिला स्तर पर साइबर थाना खोलने का प्रस्ताव तीन साल से अटका है। पुलिस मुख्यालय ने हर जिले में अलग थाना और हर थाने में साइबर हेल्प डेस्क का खाका शासन को भेजा था। योजना थी कि शुरुआत बड़े शहरों से हो और फिर पूरे प्रदेश में नेटवर्क फैले, लेकिन बजट की कमी ने फाइल को आगे नहीं बढ़ने दिया। आज स्थिति यह है कि जिला पुलिस के पास तकनीकी टीम नहीं है और स्थानीय थाने सीमित स्टाफ के साथ सिर्फ एफआईआर दर्ज कर पाते हैं।

केवल भोपाल साइबर सेल में बीते साल 3.51 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी के मामलों में केस दर्ज हुए। पूरे प्रदेश का आंकड़ा 600 करोड़ रुपये पार कर गया है। हर केस में डिजिटल ट्रेल खंगालनी होती है, बैंक से लेन-देन का ब्योरा लेना होता है, सर्वर लॉग निकालने होते हैं और आरोपी की लोकेशन ट्रेस करनी होती है। एक केस निपटाने में हफ्तों लग जाते हैं और रोज दर्जनों नए मामले टेबल पर आ जाते हैं। पूरे प्रदेश में साइबर पुलिस के स्वीकृत पद सिर्फ 290 हैं। इनमें भी 30 से ज्यादा पद खाली हैं। जो स्टाफ मौजूद है, उसमें आईटी और कंप्यूटर साइंस के विशेषज्ञों की भारी कमी है। हैकिंग, डिजिटल फोरेंसिक, सर्वर विश्लेषण और मनी ट्रेल रिकवरी जैसे कामों के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत है। 27 साइबर कंसल्टेंट की भर्ती का प्रस्ताव दो साल से लंबित है। बिना विशेषज्ञों के तकनीकी जांच अधूरी रह जाती है।

राज्य स्तर पर आधुनिक साइबर फोरेंसिक लैब, साइबर हेल्पलाइन 1930 के लिए कॉल सेंटर, ठगी की रकम तुरंत होल्ड कराने वाला मिटिगेशन सेंटर और डिजिटल जांच प्रणाली मजबूत करने की योजनाएं बनी थीं, पर बजट जारी नहीं हुआ। फाइलें आगे नहीं बढ़ीं। नतीजा यह है कि ठग एक क्लिक में खाता खाली कर देते हैं और पुलिस कागजी प्रक्रिया पूरी करने में महीनों लगा देती है।

डिजिटल अरेस्ट, फर्जी बिजली बिल, ओटीपी फ्रॉड, केवाईसी अपडेट, लोन ऐप और सोशल मीडिया फ्रेंड रिक्वेस्ट के जाल में रोज सैकड़ों लोग फंस रहे हैं। अब ठग एआई वॉइस क्लोन से रिश्तेदार की आवाज में कॉल करते हैं, यूपीआई लिंक भेजते हैं और सेकंडों में पैसा पार हो जाता है। छतरपुर के हरपालपुर में 16 वर्षीय किशोर ऑनलाइन बेटिंग ऐप के जाल में फंसकर जान दे बैठा। उसके मोबाइल में 22 बेटिंग ऐप मिले। यह बताता है कि साइबर अपराध अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक संकट भी बन चुका है।

मुख्यमंत्री के आदेश पर पुलिस ने 'सेफ क्लिक 2.0' अभियान शुरू किया है। प्रदेशभर में 50 लाख लोगों को जागरूक करने का लक्ष्य है। स्कूल, कॉलेज, सरकारी दफ्तर और सार्वजनिक स्थानों पर ऑनलाइन फ्रॉड से बचने के तरीके बताए जा रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट, फर्जी लिंक, ओटीपी साझा न करने और केवाईसी के नाम पर आने वाली कॉल से सतर्क रहने की जानकारी दी जा रही है। लेकिन जागरूकता अकेले काफी नहीं है। जब तक कार्रवाई की रफ्तार नहीं बढ़ेगी, तब तक ठग नहीं रुकेंगे।

साइबर मामलों में समय सबसे बड़ा हथियार है। ठगी के पहले 30 मिनट में खाता फ्रीज हो जाए, तो रकम बच सकती है। लेकिन भोपाल से हर जिले की अनुमति लेने और फिर बैंक से संपर्क करने में घंटों लग जाते हैं। तब तक पैसा कई वॉलेट के जरिए निकाल लिया जाता है। जिला स्तर पर साइबर थाना होगा, तो स्थानीय बैंक, स्थानीय सर्वर और स्थानीय आरोपी तक पुलिस की पहुंच तुरंत बनेगी और रिकवरी की उम्मीद भी बढ़ेगी।

शासन को चाहिए कि तीन साल से अटके प्रस्ताव को मंजूरी दे और पहले चरण में संभाग मुख्यालयों पर साइबर थाने खोले। दूसरे चरण में 290 स्वीकृत पदों को शत-प्रतिशत भरे और 27 साइबर कंसल्टेंट की भर्ती तुरंत पूरी करे। हर जिले में कम से कम एक प्रशिक्षित सब-इंस्पेक्टर और दो आरक्षक तैनात किए जाएं। राज्य स्तरीय फोरेंसिक लैब को अपग्रेड किया जाए और हर जोन में मिनी लैब स्थापित की जाए। 1930 हेल्पलाइन को 24 घंटे सक्रिय रखा जाए और कॉल आते ही बैंक को ऑटो अलर्ट भेजने की व्यवस्था की जाए।

साइबर अपराध रोकने पर किया गया खर्च वास्तव में बचत है। यदि हर साल होने वाली 600 करोड़ रुपये की ठगी रुक जाए, तो वही पैसा प्रदेश के विकास में लगाया जा सकता है। जिला खनिज निधि, स्मार्ट सिटी फंड और गृह विभाग के आधुनिकीकरण मद से इसकी शुरुआत हो सकती है। केंद्र सरकार की साइबर क्राइम प्रिवेंशन स्कीम से मैचिंग ग्रांट भी प्राप्त की जा सकती है।

पुलिस के भरोसे सब कुछ नहीं छोड़ा जा सकता। हर मोबाइल उपयोगकर्ता को भी सतर्क रहना होगा। अनजान लिंक पर क्लिक न करें, ओटीपी किसी को न बताएं, क्यूआर कोड स्कैन कर पैसा लेने के झांसे में न आएं, सोशल मीडिया पर निजी जानकारी कम साझा करें, बच्चों के फोन में पैरेंटल कंट्रोल लगाएं और किसी भी संदिग्ध कॉल या साइबर ठगी की स्थिति में 1930 पर तुरंत सूचना दें।

52 जिलों का बोझ अगर एक थाने पर रहेगा, तो ठगों की मौज रहेगी और जनता लुटती रहेगी। साइबर अपराध अब हर घर तक पहुंच चुका है और इससे लड़ने के लिए साइबर थाना भी हर जिले तक पहुंचाना होगा। स्टाफ, तकनीक और बजट की कमी दूर करनी होगी, वरना 'सेफ क्लिक' अभियान पोस्टरों तक ही सिमटकर रह जाएगा।

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