संपादकीय
03 Jul, 2026

मानसून रूठा, खेत सूखा: 28 प्रदेश, 551 जिले, 42 फीसदी कम बारिश से संकट गहराया

देशभर में सामान्य से 42 प्रतिशत कम वर्षा के कारण खरीफ की बुवाई, जल भंडार, कृषि उत्पादन और किसानों की चिंता एक साथ बढ़ती दिखाई दे रही है।

नई दिल्ली, 3 जुलाई।

आसमान ने इस बार किसानों से मुंह मोड़ लिया है। जून माह में देशभर में मानसून की बेरुखी ने रिकॉर्ड तोड़ दिया है। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 1 जून से 29 जून तक देश में सामान्य से 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। यह गिरावट केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि करोड़ों किसानों की उम्मीदों का सूखना है। 28 प्रदेशों और 741 में से 551 जिलों में बारिश की कमी ने खरीफ की बुवाई पर ग्रहण लगा दिया है।

आंकड़े चौंकाने वाले हैं। देश के बड़े कृषि उत्पादक राज्यों में हालत सबसे खराब है। राजस्थान में 20 से ज्यादा जिलों में मानसून अब तक पहुंचा ही नहीं है। वहां औसतन 10 दिन की देरी हो चुकी है। गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के बड़े हिस्सों में बादल मंडरा रहे हैं, पर बरस नहीं रहे। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में धान की नर्सरी सूखने लगी है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में धान की रोपाई रुक गई है। पंजाब और हरियाणा में भूजल पर दबाव बढ़ गया है, क्योंकि नहरों में पानी नहीं है और किसान ट्यूबवेल से सिंचाई कर रहे हैं।

असम और अरुणाचल प्रदेश में भारी बारिश ने नुकसान किया है। सोमवार को असम के धेमाजी जिले में नदी में आई बाढ़ से 300 मीटर लंबा लोहे का रेलवे पुल बह गया। इससे कई इलाकों का सड़क और रेल संपर्क टूट गया है। अरुणाचल प्रदेश में भूस्खलन से तीन लोगों की मौत हो चुकी है। एक तरफ सूखा और दूसरी तरफ बाढ़, यह मौसम का दोहरा वार है।

देश में खरीफ की कुल बुवाई का लक्ष्य 1090 लाख हेक्टेयर है, पर अब तक सिर्फ 260 लाख हेक्टेयर में ही बुवाई हो पाई है, जो सामान्य से 35 प्रतिशत कम है। धान, दलहन, तिलहन, कपास और मक्का, सभी फसलों की बुवाई पिछड़ गई है। कृषि मंत्रालय मान रहा है कि अगर अगले सात दिन में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो खरीफ उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। अनाज, दलहन और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी आएगी और महंगाई का दबाव बढ़ेगा।

मानसून की 42 फीसदी कमी केवल मौसम की खबर नहीं है। यह देश की खाद्य सुरक्षा, रोजगार और अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल है। 28 प्रदेशों और 551 जिलों में कम बारिश ने बता दिया है कि हम प्रकृति के भरोसे कब तक रह सकते हैं। अब वक्त है कि सरकार, किसान, वैज्ञानिक और समाज मिलकर पानी बचाने और सूखे से लड़ने की रणनीति बनाएं। वरना एक सूखा महीना पूरे साल की थाली खाली कर सकता है। बादल अगर रूठ गए हैं, तो इंतजाम हमें करने होंगे, क्योंकि खेत सूखा तो देश की रोटी भी सूख जाएगी।

पटियाला में वर्षा के बिना सूखती धान की फसल को देखता किसान आंखों में सवाल लिए खड़ा है। उसने कर्ज लेकर बीज और खाद डाला था, पर खेत में दरारें पड़ गई हैं। राजस्थान के बाड़मेर में बाजरा की बुवाई का समय निकल रहा है, पर खेत तैयार नहीं हैं। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में सोयाबीन के बीज अंकुरित होकर सूख गए हैं। बुंदेलखंड में किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। हर जगह एक ही सवाल है कि बादल कब बरसेंगे?

मौसम वैज्ञानिक बता रहे हैं कि इस बार अल नीनो का असर मजबूत है। प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ने से भारत में मानसून की हवा कमजोर पड़ गई है। बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र नहीं बना और अरब सागर में भी कोई प्रभावी सिस्टम सक्रिय नहीं रहा। जून में मानसून ट्रफ सामान्य से उत्तर में रही, जिससे मध्य और उत्तर भारत सूखा रह गया। अब जुलाई के पहले सप्ताह में बंगाल की खाड़ी में नया सिस्टम बनने की उम्मीद है, पर तब तक देरी का नुकसान हो चुका होगा।

कम बारिश का असर केवल खेतों पर नहीं है। देश के 150 प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर उनकी कुल क्षमता का सिर्फ 28 प्रतिशत रह गया है। पिछले साल इसी समय यह 35 प्रतिशत था। मध्यप्रदेश के गांधी सागर, राजस्थान के बीसलपुर और महाराष्ट्र के जायकवाड़ी बांध में पानी तेजी से घट रहा है। शहरों में पेयजल आपूर्ति पर दबाव बढ़ेगा और उद्योगों को भी पानी की कटौती झेलनी पड़ सकती है।

केंद्र सरकार ने राज्यों को अलर्ट जारी किया है। कृषि विभाग ने आकस्मिक फसल योजना तैयार करने को कहा है। इसमें कम अवधि वाली दलहन और मोटे अनाज की बुवाई का विकल्प दिया गया है। बीमा कंपनियों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत तेजी से सर्वे करने के निर्देश दिए गए हैं। पर जमीन पर किसान कह रहे हैं कि बीमा का दावा समय पर नहीं मिलता और कागजी प्रक्रिया लंबी है।

हर जिले में मौसम आधारित कृषि सलाह समय पर पहुंचे। कृषि विज्ञान केंद्र मोबाइल संदेश और रेडियो के जरिए किसानों को बताएं कि अब कौन-सी फसल लगानी चाहिए। दूसरा, मनरेगा को सिंचाई से जोड़ा जाए। खेत-तालाब, नाला निर्माण और जल संरक्षण के काम तुरंत शुरू हों। तीसरा, बीज और खाद की वैकल्पिक व्यवस्था हो। कम पानी में होने वाली बाजरा, ज्वार, मूंग और उड़द के बीज मुफ्त बांटे जाएं। चौथा, ग्रामीण इलाकों में दिन के समय बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए, ताकि किसान ट्यूबवेल चला सकें। पांचवां, फसल बीमा का भुगतान 30 दिन के भीतर हो और नुकसान का आकलन सैटेलाइट के माध्यम से किया जाए, ताकि पटवारी की रिपोर्ट का इंतजार न करना पड़े। छठा, शहरों में पानी की बर्बादी रोकी जाए और वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) अनिवार्य किया जाए।

केवल तात्कालिक राहत से बात नहीं बनेगी। देश को जलवायु-अनुकूल खेती की ओर बढ़ना होगा। सूखा सहन करने वाली किस्में, ड्रिप सिंचाई, तालाब आधारित खेती और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना जरूरी है। हर पंचायत में जल बजट बने और भूजल का लेखा-जोखा रखा जाए। नदियों को जोड़ने और छोटे बांध बनाने की योजनाओं में भी तेजी लानी होगी।

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आज का राशिफल

समय नकारात्मक परिणाम देने वाला बन रहा है। ले देकर की जा रही काम की कोशिश ठीक नहीं। कार्यक्षेत्र में आगे बढऩे में रुकावट का एहसास होगा। विरोधियों के सक्रिय होने की संभावना है। कारोबारी यात्रा को फिलहाल टालें। जो चल रहा है उसे सावधानीपूर्वक संभालें। शुभांक-1-3-6

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