भोपाल, 3 जुलाई।
भोपाल जिले में राजस्व विभाग की साख पर गंभीर सवाल उठे हैं। खबर के अनुसार, 30 सरकारी मशीनें होने के बावजूद सीमांकन का काम निजी सर्वेयरों के भरोसे चल रहा है। आरोप है कि आरआई और पटवारी किसानों से प्रति एकड़ सीमांकन के नाम पर 10 हजार रुपये तक वसूल रहे हैं। यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। जनसुनवाई में पहुंच रही शिकायतें बताती हैं कि सरकारी तंत्र खुद नियमों को तोड़कर दलाल तंत्र को बढ़ावा दे रहा है।
जिले में सीमांकन के लिए 30 सरकारी मशीनें मौजूद हैं। हर मशीन की कीमत लाखों रुपये है और प्रशिक्षित कर्मचारी भी तैनात हैं। इसके बावजूद किसानों को निजी सर्वेयरों का सहारा लेना पड़ रहा है। कारण साफ है—मशीनें या तो खराब हैं या उनका उपयोग नहीं हो रहा। किसान का आरोप है कि पटवारी और आरआई टालमटोल करते हैं और अंततः निजी सर्वेयर बुलाने की सलाह देते हैं। निजी सर्वेयर 10 से 20 हजार रुपये तक वसूलते हैं, जबकि सरकारी शुल्क इससे कहीं कम है।
सीमांकन में देरी से भाई-भाई के विवाद बढ़ते हैं, बैंक ऋण और फसल बीमा जैसी सुविधाएं प्रभावित होती हैं। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर वसूली का खेल चलता है। आरोप है कि भुगतान नहीं करने पर रिपोर्ट में जानबूझकर गड़बड़ी कर दी जाती है, जिससे मामला अदालत तक पहुंच जाता है।
सरकार को तत्काल 30 सरकारी मशीनों का ऑडिट कर उन्हें चालू करना चाहिए। सीमांकन की समय-सीमा तय हो, शुल्क सूची सार्वजनिक की जाए और लोक सेवा गारंटी कानून के तहत देरी पर जवाबदेही तय हो। ड्रोन, सैटेलाइट और जीआईएस आधारित डिजिटल सीमांकन प्रणाली अपनाकर पारदर्शिता लाई जा सकती है।
सीमांकन किसान के अधिकार और उसकी जमीन की पहचान का प्रश्न है। यदि सरकारी संसाधन होने के बावजूद किसान को निजी वसूली का शिकार होना पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है। जरूरत है कि नापतोल का यह खेल बंद हो और किसान को उसका अधिकार पारदर्शी, समयबद्ध और निष्पक्ष तरीके से मिले।
















