तेहरान, 3 जुलाई।
जंग ने ईरान को हराया नहीं, बल्कि उसे और केंद्रीकृत कर दिया है। गार्ड कॉर्प्स अब सिर्फ फौजी ताकत नहीं, बल्कि राजनीतिक सत्ता का पर्याय बन चुका है। लोकतंत्र की धीमी आहट युद्ध के शोर में दब गई है और इसका असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं रहेगा। मध्यपूर्व से लेकर दक्षिण एशिया तक इसकी गूंज सुनाई देगी। इतिहास गवाह है कि युद्ध बाहर से थोपा जाता है, पर सत्ता भीतर से बदल जाती है। ईरान आज इसी बदलाव का जीवंत उदाहरण बन गया है।
अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिवसीय तनाव ने आखिरकार जंग का रूप ले लिया। पहली नजर में यह संघर्ष सिर्फ हथियारों की टकराहट लगता है, मगर इसके भीतर सत्ता संरचना की बुनियाद हिल गई है। जब जंग किसी राष्ट्र की सीमाओं पर नहीं, बल्कि उसके भीतर शक्तियों को जन्म देती है, तब लोकतंत्र की धीमी आवाजें दब जाती हैं और वर्दी का शोर तेज हो जाता है। यही विडंबना आज ईरान की हकीकत बन चुकी है।
अमेरिका और इजराइल ने जिस युद्ध की कल्पना ईरान की सैन्य शक्ति को कमजोर करने और उसकी राजनीतिक क्षमता को सीमित करने के लिए की थी, उसका सबसे बड़ा परिणाम ठीक विपरीत निकला है। जंग ने ईरान को अधिक उदार नहीं, बल्कि अधिक सैन्यीकृत बना दिया है। जिस इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को कभी सत्ता के अनेक स्तंभों में से एक माना जाता था, वह आज लगभग संपूर्ण शक्ति का केंद्र बनकर उभर चुका है। यह परिवर्तन केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक भी है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद होती है और युद्ध की सबसे बड़ी शक्ति सैन्य एकजुटता। जब कोई राष्ट्र युद्ध में उतरता है, तब संसदों की जगह जनरल फैसले करने लगते हैं। ईरान में भी यही हुआ।
युद्ध से पहले ईरान की सत्ता में राष्ट्रपति, संसद, सुधारवादी धड़े, उदारवादी बुद्धिजीवी और सर्वोच्च नेता के बीच शक्ति संतुलन था। अब यह संतुलन टूट गया है। रिवोल्यूशनरी गार्ड ने न सिर्फ युद्ध का नेतृत्व किया, बल्कि युद्ध के बाद आंतरिक सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति तक पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया है। सत्ता गार्ड के हाथों में सिमट रही है। यही शायद इस पूरे संघर्ष की सबसे बड़ी त्रासदी भी है। यदि उद्देश्य ईरान के सैन्य प्रभाव को कम करना था, तो परिणाम उसके विपरीत निकला है। गार्ड को केवल हथियार ही नहीं मिले, बल्कि उसे वैधता भी मिल गई। बाहरी खतरे ने आंतरिक असहमतियों को दबा दिया और जनता को एकजुट करने का कारण बन गया।
ईरान में सुधारवादी और उदारवादी खेमा लंबे समय से नागरिक अधिकारों, महिला स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय संवाद की बात कर रहा था। युद्ध ने इन आवाजों को कमजोर कर दिया। अब राष्ट्र की प्राथमिकता सुरक्षा बन गई है और सुरक्षा के नाम पर असहमति को देशद्रोह करार देना आसान हो गया है। विश्वविद्यालयों में बहस बंद है, अखबारों में सेंसरशिप तेज है और सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ गई है। यह स्थिति बताती है कि बाहरी युद्ध कैसे भीतर की राजनीति को सैन्यीकृत कर देता है।
यह पहली बार नहीं है, जब युद्ध ने सत्ता का चेहरा बदला हो। 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद वहां भी सेना और मिलिशिया का दबदबा बढ़ा था। अफगानिस्तान में दो दशक की लड़ाई के बाद तालिबान और मजबूत होकर लौटा। ईरान में भी वही पैटर्न दिखाई दे रहा है। जब किसी देश पर हमला होता है, तो वहां की जनता बाहरी ताकत के खिलाफ एकजुट होती है और उस एकजुटता का नेतृत्व वही करता है, जिसके पास बंदूक होती है। लोकतांत्रिक संस्थाएं युद्ध की आग में सबसे पहले झुलसती हैं।
युद्ध का एक और असर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पड़ा है। पहले जहां बातचीत की गुंजाइश थी, अब राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर परमाणु क्षमता को और तेज करने की मांग उठ रही है। गार्ड कॉर्प्स इसे प्रतिरोध की गारंटी बता रहा है। वैचारिक मोर्चे पर भी बदलाव आया है। अमेरिका और इजराइल को 'शैतान' बताने वाला नैरेटिव और गहरा हुआ है। स्कूलों में शहादत का पाठ बढ़ा है और युवा पीढ़ी को युद्ध ही समाधान नजर आने लगा है।
युद्ध और प्रतिबंधों ने पहले ही ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया था। अब सैन्य खर्च और बढ़ गया है। तेल निर्यात पर दबाव है, मुद्रा गिर रही है और महंगाई चरम पर है। पर सत्ता इसे बाहरी साजिश बताकर जनता से और कुर्बानी मांग रही है। गार्ड कॉर्प्स के नियंत्रण वाले उद्योगों को प्राथमिकता मिल रही है और निजी क्षेत्र सिकुड़ रहा है। इससे मध्यम वर्ग का असंतोष बढ़ेगा, पर दमन के डर से उसकी आवाज बाहर नहीं आ पाएगी।
युद्ध ने ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को भी नई ऊर्जा दी है। लेबनान, यमन, इराक और सीरिया में ईरान समर्थित गुट अब खुद को विजेता मान रहे हैं। उनका मनोबल बढ़ा है और इजराइल के लिए चुनौती भी बड़ी हुई है। सऊदी अरब और खाड़ी देश अब ईरान से सीधी टक्कर से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि युद्ध ने तेहरान को कमजोर नहीं, बल्कि और आक्रामक बना दिया है।
दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम एक चेतावनी है। जब युद्ध किसी देश की आंतरिक सत्ता को सैन्य हाथों में सौंप देता है, तो बातचीत की खिड़की बंद हो जाती है। भारत के लिए ईरान चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से अहम है, पर अब वहां नीति बनाने वाले चेहरे बदल गए हैं। कूटनीति को अब गार्ड कॉर्प्स की भाषा समझनी होगी। दुनिया को यह समझना होगा कि सैन्य कार्रवाई अक्सर उस समस्या को और बड़ा कर देती है, जिसे वह खत्म करने चली थी।
अगर अंतरराष्ट्रीय समुदाय वास्तव में मध्यपूर्व में स्थिरता चाहता है, तो उसे युद्ध के बजाय संवाद का रास्ता चुनना होगा। प्रतिबंधों और बमों से सत्ता नहीं बदलती, बल्कि और कठोर हो जाती है। ईरान की जनता को लोकतांत्रिक विकल्प चाहिए, पर वह विकल्प बंदूक की नोक पर नहीं आ सकता। इसके लिए जरूरी है कि युद्धविराम के साथ आर्थिक राहत और सांस्कृतिक संवाद के दरवाजे खोले जाएं। वरना जंग ने ईरान के भीतर जो शक्ति संतुलन बदला है, वह पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर देगा।

















