नई दिल्ली, 24 जुलाई।
देश में आयुष शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी कॉलेजों में घोस्ट फैकल्टी और फर्जी दस्तावेजों के सहारे संस्थान चलाने की गुंजाइश लगभग समाप्त हो जाएगी। राष्ट्रीय आयुष आयोग ने सभी आयुष कॉलेजों के लिए नए और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका पालन नहीं करने वाले कॉलेजों की मान्यता रद्द की जा सकती है और उनकी सीटों में 20 प्रतिशत तक की कटौती भी संभव है। यह फैसला आयुष शिक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखने और छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से लिया गया है। पिछले कई वर्षों से ऐसे कॉलेजों की शिकायतें लगातार सामने आ रही थीं, जहां कागजों पर फैकल्टी पूरी दिखाई जाती थी, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग होती थी।
नए नियमों के अनुसार अब किसी भी आयुष कॉलेज को मान्यता तभी मिलेगी, जब वह सभी निर्धारित मानकों का पालन करेगा। सबसे बड़ा बदलाव बायोमेट्रिक उपस्थिति को लेकर किया गया है। अब प्रत्येक कॉलेज में शिक्षकों और कर्मचारियों की उपस्थिति बायोमेट्रिक प्रणाली से दर्ज होगी। यदि किसी संस्थान में यह व्यवस्था नहीं पाई गई या उसमें गड़बड़ी मिली, तो उसे मान्यता नहीं मिलेगी। इसका सीधा अर्थ है कि अब केवल कागजों पर शिक्षक दिखाकर कॉलेज नहीं चलाए जा सकेंगे। आयोग का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां दस्तावेजों में 20 से 25 शिक्षक दर्ज थे, जबकि वास्तव में केवल चार या पांच शिक्षक ही मौजूद रहते थे। बाकी सभी केवल कागजी फैकल्टी थे।
नए प्रावधान फैकल्टी और संस्थागत व्यवस्थाओं की कमियों को भी सीधे प्रभावित करेंगे। यदि किसी कॉलेज में निर्धारित संख्या से कम शिक्षक पाए गए तो पांच प्रतिशत सीटों में कटौती की जाएगी। कमी अधिक होने पर यह कटौती 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इतना ही नहीं, यदि किसी विभाग में एक भी शिक्षक कम पाया गया तो उस विभाग में नए प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है। पहले कई कॉलेज आवश्यक शिक्षकों के बिना भी प्रवेश ले लेते थे और बाद में व्यवस्था करने का दावा करते थे, लेकिन अब आयोग हर वर्ष भौतिक और डिजिटल दोनों माध्यमों से निरीक्षण करेगा।
नियम केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं हैं। कॉलेजों में प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शिक्षण अस्पताल और छात्रावास जैसी मूलभूत सुविधाएं भी निर्धारित मानकों के अनुरूप होना अनिवार्य होगा। यदि निरीक्षण में ये सुविधाएं अधूरी पाई गईं तो संबंधित कॉलेज पर जुर्माना लगाया जा सकता है और बार-बार उल्लंघन होने पर मान्यता भी समाप्त की जा सकती है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब फीस संरचना पूरी तरह पारदर्शी होगी। कॉलेज मनमाने ढंग से शुल्क नहीं वसूल सकेंगे और उन्हें अपनी फीस वेबसाइट पर सार्वजनिक करनी होगी, ताकि छात्रों और अभिभावकों को किसी प्रकार की भ्रम या धोखाधड़ी का सामना न करना पड़े।
सबसे सख्त प्रावधान शिक्षकों की योग्यता और अनुभव को लेकर किए गए हैं। अब केवल वही शिक्षक नियुक्त किए जा सकेंगे, जिनके पास आयोग द्वारा निर्धारित योग्यता और अनुभव होगा। फर्जी डिग्री या अनुभव प्रमाण-पत्र के आधार पर नियुक्ति करने वाले संस्थानों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई तक की जा सकती है। आयोग का स्पष्ट मत है कि आयुष चिकित्सा से जुड़े छात्रों की गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि अयोग्य चिकित्सक का सीधा असर मरीजों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
इन निर्देशों के बाद देशभर के आयुष कॉलेजों में हलचल बढ़ गई है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में आयुष कॉलेज संचालित हैं और कई संस्थानों की जांच पहले से जारी है। भोपाल सहित प्रदेश के कई कॉलेजों की शिकायतें भी आयोग तक पहुंची थीं। कॉलेज संचालकों का कहना है कि अचानक लागू हुई इतनी सख्ती से उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि योग्य शिक्षकों की उपलब्धता और बेहतर अधोसंरचना विकसित करने में समय और संसाधनों की आवश्यकता होती है। दूसरी ओर छात्र और अभिभावक इस निर्णय का स्वागत कर रहे हैं। उनका मानना है कि वर्षों से वे भारी फीस देकर ऐसे संस्थानों में पढ़ रहे थे, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भले देर से आया हो, लेकिन सही दिशा में उठाया गया कदम है। आयुष भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा है और कोविड के बाद इसकी स्वीकार्यता दुनिया भर में बढ़ी है। ऐसे समय में यदि आयुष शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर रही तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा के क्षेत्र में केवल वही संस्थान बने रहें, जो निर्धारित मानकों का पालन करें।
आयोग ने सभी कॉलेजों को नए सत्र से पहले अपनी जानकारी पोर्टल पर अद्यतन करने और स्व-मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। निरीक्षण में अनियमितता मिलने पर पहले सुधार का अवसर दिया जाएगा, लेकिन लगातार लापरवाही बरतने पर मान्यता रद्द करने, सीटें घटाने और जुर्माना लगाने जैसी कार्रवाई की जाएगी। छात्रों से भी अपील की गई है कि प्रवेश लेने से पहले संबंधित कॉलेज की मान्यता और सुविधाओं की पूरी जानकारी अवश्य जांच लें।
आयुष शिक्षा के लिए यह एक नई शुरुआत है। अब शिक्षा के नाम पर केवल कागजी संस्थान चलाना आसान नहीं होगा। सरकार का संदेश स्पष्ट है कि गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यदि कॉलेज निर्धारित नियमों का पालन करेंगे तो देश को बेहतर आयुष चिकित्सक मिलेंगे, अन्यथा ऐसे संस्थानों के लिए व्यवस्था में कोई स्थान नहीं बचेगा।















