भोपाल, 24 जुलाई।
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून, 2009 का उद्देश्य था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का कोई भी बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित न रहे। इसी सोच के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गईं और सरकार ने इन विद्यार्थियों की फीस का भुगतान करने की जिम्मेदारी ली। लेकिन मध्यप्रदेश में पिछले दो वर्षों से यह व्यवस्था गंभीर संकट में है। निजी स्कूल संचालकों का कहना है कि सरकार ने फीस प्रतिपूर्ति का भुगतान नहीं किया है, जिसके कारण कई स्कूल आरटीई के तहत नए प्रवेश देने से बच रहे हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब परिवारों को उठाना पड़ रहा है, जिनके बच्चों के लिए यही योजना बेहतर शिक्षा का एकमात्र माध्यम थी।
उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में आरटीई के तहत आवेदन और प्रवेश दोनों में लगातार गिरावट आई है। वर्ष 2021-22 में लगभग 2.84 लाख आवेदन आए थे और करीब 1.29 लाख बच्चों को प्रवेश मिला था। वहीं 2025-26 में आवेदन घटकर लगभग 1.67 लाख रह गए और प्रवेश केवल 78 हजार के आसपास सिमट गए। यदि यह स्थिति बनी रही तो आरटीई का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो जाएगा।
निजी स्कूलों की अपनी व्यावहारिक कठिनाइयां भी हैं। आरटीई के तहत प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की फीस सरकार से मिलनी होती है। यदि वर्षों तक भुगतान लंबित रहे तो स्कूलों के लिए शिक्षकों का वेतन, बिजली-पानी का खर्च, पुस्तकें और अन्य व्यवस्थाएं बनाए रखना कठिन हो जाता है। ऐसे में कई संस्थानों ने आरटीई सीटों पर प्रवेश सीमित करने या बंद करने की चेतावनी दी है। यह स्थिति किसी के हित में नहीं है।
दूसरी ओर सरकारी स्कूलों की चुनौतियां भी किसी से छिपी नहीं हैं। अनेक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं का अभाव और गुणवत्ता से जुड़े प्रश्न आज भी बने हुए हैं। आरटीई का उद्देश्य ही यह था कि गरीब बच्चों को भी निजी विद्यालयों जैसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर मिले। यदि निजी स्कूल पीछे हटेंगे तो इस कानून की भावना कमजोर पड़ जाएगी।
सरकार का तर्क है कि बजट और फंड की कमी के कारण भुगतान नहीं हो सका। लेकिन शिक्षा पर खर्च को व्यय नहीं, बल्कि भविष्य में निवेश माना जाना चाहिए। यदि बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी तो उसका असर आने वाले वर्षों में रोजगार, सामाजिक विकास और आर्थिक प्रगति पर भी पड़ेगा। शिक्षा में निवेश का लाभ पूरे समाज को मिलता है।
अब आवश्यकता है कि सरकार लंबित प्रतिपूर्ति शीघ्र जारी करे और भुगतान की स्थायी एवं समयबद्ध व्यवस्था बनाए। फीस की दरों की भी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप समीक्षा होनी चाहिए, ताकि निजी स्कूलों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। साथ ही पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो, जिससे यह स्पष्ट रहे कि भुगतान किस स्तर पर लंबित है।
शिक्षा केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है। आरटीई कानून गरीब बच्चों को समान अवसर देने का माध्यम है। यदि आर्थिक कारणों से यह व्यवस्था कमजोर पड़ती है तो सबसे बड़ा नुकसान उन बच्चों का होगा, जिनके सपनों का आधार यही कानून है। सरकार, निजी स्कूल और समाज—तीनों की जिम्मेदारी है कि इस व्यवस्था को जीवित रखें, क्योंकि शिक्षा पर किया गया निवेश ही भविष्य के सशक्त और समृद्ध भारत की सबसे मजबूत नींव है।














