कोलकाता, 29 जुलाई।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की एक हालिया प्रदर्शन लेखा परीक्षा रिपोर्ट ने पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल की इस रिपोर्ट (वर्ष 2016-17 से 2021-22) में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि सूबे के पास अपनी कोई स्वतंत्र स्वास्थ्य नीति तक नहीं थी और यहां की स्वास्थ्य योजनाओं को संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप तैयार ही नहीं किया गया था।
इस अन्वेषण के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग विभिन्न चिकित्सा संवर्गों के स्वीकृत पदों का मुकम्मल रिकॉर्ड तक मेंटेन नहीं कर पाया। राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 36 प्रतिशत तथा सामान्य श्रेणी के डॉक्टरों के 49 प्रतिशत पद खाली पड़े मिले, और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में तो स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी किल्लत 91.14 प्रतिशत तक जा पहुंची। इसके अतिरिक्त लैब तकनीशियनों के तीन-चौथाई यानी 75 प्रतिशत पद रिक्त थे, और 89 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों में एक भी पुरुष स्वास्थ्यकर्मी तैनात नहीं था।
कैग के आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य के 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 51 जगहों पर स्टाफ नर्स, 29 में फार्मासिस्ट, 30 में प्रयोगशाला तकनीशियन और 251 केंद्रों में रेडियोग्राफर का भारी अभाव पाया गया। इसके अलावा 341 केंद्रों में ऑपरेशन थिएटर परिचारक भी नदारद मिले।
आपातकालीन और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की हालत तो और भी ज्यादा बदतर मिली। राज्य के 71 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में इमरजेंसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं, और 90 प्रतिशत केंद्रों में सिजेरियन प्रसव जैसी आपातकालीन प्रसूति व्यवस्था का नामोनिशान नहीं था। करीब 70 प्रतिशत प्राथमिक चिकित्सालयों में मरीजों के लिए कार्यशील बिस्तरों का भी टोटा पाया गया। इतना ही नहीं, 348 सामुदायिक केंद्रों में से 284 स्थानों पर सिजेरियन या शल्य प्रसव की कोई सुविधा नहीं थी और 81.89 प्रतिशत केंद्रों में ब्लड बैंक या रक्त भंडारण इकाई तक मौजूद नहीं थी।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 45 प्रतिशत उप स्वास्थ्य केंद्रों का निरीक्षण करने चिकित्सक महीने में एक बार भी नहीं पहुंचे। हैरान करने वाली बात यह है कि 99.56 प्रतिशत घरेलू प्रसव बिना किसी प्रशिक्षित प्रसहायक की उपस्थिति के कराए गए, जिससे जच्चा-बच्चा की जान को हमेशा खतरा बना रहता है।
चिकित्सा ढांचे और आधुनिक उपकरणों की स्थिति भी अत्यंत दयनीय पाई गई। लगभग 23 प्रतिशत जैव-चिकित्सा उपकरणों का कभी कैलिब्रेशन यानी अंशांकन ही नहीं किया गया था। पीएम केयर्स फंड तथा कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत लगाए गए 57.33 प्रतिशत ऑक्सीजन प्लांट दिसंबर 2023 तक या तो बंद पड़े थे या फिर चालू ही नहीं हो सके थे। इसके अलावा 11वीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत स्वीकृत पांचों ट्रॉमा केयर सेंटर 15 वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक शुरू नहीं हो पाए हैं।
कैग ने फंड के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितताओं पर भी कड़ी आपत्ति जताई है। रिपोर्ट में ट्रॉमा केयर केंद्रों के लिए आवंटित 2.42 करोड़ रुपये के विचलन के साथ-साथ 8.41 करोड़ रुपये तथा बर्न यूनिट के लिए मिले 12.68 करोड़ रुपये की राशि का उपभोग न किए जाने का गंभीर मामला भी उजागर किया गया है।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि मार्च 2022 तक राज्य सरकार के पास कोई दवा नीति तक नहीं थी। दवाओं के 30 प्रतिशत नमूनों की गुणवत्ता जांच रिपोर्ट समय पर प्राप्त नहीं हुई, जिससे घटिया और मानक से कम स्तर की दवाइयां सीधे मरीजों तक पहुंचने की आशंका लगातार बनी रही। जिला अस्पतालों में अधिसूचित आवश्यक दवाओं में से 63 प्रतिशत की तो कभी खरीद ही नहीं की गई, जिसके चलते दवाओं की भयंकर कमी हमेशा बनी रही।
कैग के अनुसार, वर्ष 2017-18 से 2021-22 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र का राजस्व व्यय तो 125 प्रतिशत तक बढ़ गया, किंतु पूंजीगत व्यय में 12 प्रतिशत की भारी गरावट दर्ज की गई। राज्य का कुल स्वास्थ्य खर्च सकल राज्य घरेलू उत्पाद का बमुश्किल 1.23 प्रतिशत रहा, जबकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत इसे कम से कम 2.5 प्रतिशत तक रखने का लक्ष्य तय किया गया है। राज्य के कुल बजट खर्च में स्वास्थ्य पर हुआ खर्च 4.24 से 6.37 प्रतिशत के दायरे में सिमटा रहा, जो निर्धारित 8 प्रतिशत के न्यूनतम लक्ष्य से कोसों दूर है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में भी भारी खासियत और कमियां देखने को मिलीं। राज्य के 67 प्रतिशत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में वृद्धजनों के लिए कोई पृथक स्वास्थ्य सेवा मौजूद नहीं थी। लगभग 39 प्रतिशत मातृ मृत्यु मामलों की आंतरिक समीक्षा तक नहीं की गई और शिशु मृत्यु की समीक्षा की व्यवस्था भी पूरी तरह कागजी साबित हुई। इसके अतिरिक्त, राज्य में राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानकों के मुताबिक कोई ठोस कार्ययोजना तथा पुलिस, चिकित्सा एवं अग्निशमन सेवाओं को आपस में जोड़ने वाली एकीकृत 108 इमरजेंसी एम्बुलेंस सेवा का भी लाजिमी अभाव पाया गया।

















