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मध्य प्रदेश
31 Jul, 2026

प्रदेश में साइबर ठगी की स्थिति विस्फोट,एक साल में 600 करोड़ से ज्यादा की ठगी

मध्य प्रदेश में साइबर ठगी के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है और सीमित संसाधनों के बीच पुलिस के सामने अपराधियों तक पहुंचने की बड़ी चुनौती बनी हुई है।

भोपाल, 31 जुलाई।

मध्य प्रदेश में साइबर ठगी के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। ऑनलाइन धोखाधड़ी का दायरा इतना बढ़ गया है कि चालू वर्ष में ही साइबर ठगी का आंकड़ा 600 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है। वहीं इतने बड़े अपराध नेटवर्क की जांच के लिए प्रदेश में आईटी एक्ट के तहत विवेचना का अधिकार रखने वाले निरीक्षकों की संख्या काफी कम है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित संसाधनों और तकनीकी विशेषज्ञों की कमी के कारण साइबर अपराधियों तक पहुंचना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

चार साल में 1100 प्रतिशत बढ़ी ठगी

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में प्रदेश में साइबर ठगी की राशि में 1100 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2025 में साइबर अपराधियों ने करीब 634 करोड़ रुपये की ठगी की थी।

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए बैंकों में करीब 137 करोड़ रुपये की राशि होल्ड कराई थी, लेकिन इसके बावजूद अधिकतर मामलों में पीड़ितों को पूरी रकम वापस दिलाना मुश्किल साबित हो रहा है।

प्रदेश में हर साल 2500 से अधिक साइबर ठगी के मामले दर्ज हो रहे हैं, लेकिन जांच एजेंसियों के पास पर्याप्त विशेषज्ञ अधिकारी और आधुनिक तकनीकी सुविधाओं की कमी बनी हुई है।

300 कर्मचारियों के भरोसे साइबर पुलिस

साइबर पुलिस के लिए वर्ष 2013 में 293 पद स्वीकृत किए गए थे। सीधी भर्ती के माध्यम से केवल 54 पुलिसकर्मियों की नियुक्ति हो सकी। वर्तमान में जिला पुलिस से प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मचारियों सहित साइबर पुलिस का अमला करीब 300 लोगों का है।

प्रदेश में आईटी एक्ट के तहत जांच का अधिकार केवल निरीक्षक स्तर के अधिकारियों को है। ऐसे निरीक्षकों की संख्या पूरे प्रदेश में केवल 19 है। इसके अलावा 22 उपनिरीक्षक साइबर शाखा में पदस्थ हैं।

भोपाल में ही साइबर थाना संचालित

प्रदेश में फिलहाल केवल भोपाल में साइबर थाना संचालित है। अन्य जिलों में साइबर अपराधों की एफआईआर सामान्य थानों में दर्ज होती है, जिससे जांच की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

डिजिटल फोरेंसिक लैब और आधुनिक तकनीकी संसाधनों से जुड़े कई प्रस्ताव अभी भी शासन स्तर पर लंबित बताए जा रहे हैं।

तीन आधारों से आगे बढ़ती है जांच

साइबर ठगी की जांच में पुलिस के पास मुख्य रूप से मोबाइल नंबर, बैंक खाता और इंटरनेट मीडिया अकाउंट तीन प्रमुख सुराग होते हैं। हालांकि अपराधी अक्सर फर्जी सिम, म्यूल बैंक खातों और नकली डिजिटल पहचान का इस्तेमाल करते हैं, जिससे उनकी असली पहचान तक पहुंचना कठिन हो जाता है।

भोपाल साइबर के एसपी प्रणय नागवंशी ने बताया कि साइबर अपराधों की जांच में मोबाइल नंबर, बैंक खाते और इंटरनेट मीडिया अकाउंट महत्वपूर्ण कड़ियां होती हैं। उन्होंने कहा कि मोबाइल नंबर किसी व्यक्ति के नाम पर होने का मतलब यह नहीं कि वही उसका इस्तेमाल कर रहा हो। वहीं बैंक और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जानकारी जुटाने में भी समय लगता है।

अलग साइबर कैडर की मांग

बढ़ते साइबर अपराधों को देखते हुए विशेषज्ञ लंबे समय से साइबर पुलिस के लिए अलग कैडर बनाने की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में व्यवस्था जिला पुलिस से प्रतिनियुक्त कर्मचारियों के माध्यम से संचालित हो रही है।

पुलिस मुख्यालय का कहना है कि भविष्य में साइबर पुलिस के लिए अलग कैडर तैयार करने की योजना पर काम किया जा रहा है।

लगातार बढ़ते साइबर अपराध संकेत दे रहे हैं कि यदि जांच एजेंसियों को पर्याप्त तकनीकी संसाधन, प्रशिक्षित मानवबल और आधुनिक डिजिटल जांच प्रणाली उपलब्ध नहीं कराई गई तो आने वाले समय में इन अपराधों पर नियंत्रण और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

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