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संपादकीय
01 Aug, 2026

युद्ध अब सीमाओं पर नहीं, समाज के भीतर लड़े जाते हैं

आधुनिक दौर में युद्ध के बदलते स्वरूप, सूचना तंत्र, सामाजिक ध्रुवीकरण और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते मनोवैज्ञानिक प्रभावों के बीच नागरिक जागरूकता की आवश्यकता को समझना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

नई दिल्ली, 01 अगस्त।

एक समय था जब किसी देश को कमजोर करने के लिए सेनाएं उसकी सीमाओं पर हमला करती थीं। टैंक आगे बढ़ते थे, मिसाइलें दागी जाती थीं और युद्ध का परिणाम रणभूमि में तय होता था। लेकिन इक्कीसवीं सदी में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। अब लड़ाई केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि लोगों के मन, समाज और सूचना तंत्र के भीतर भी लड़ी जाती है। रक्षा विशेषज्ञ इसे हाइब्रिड वॉरफेयर, सूचना युद्ध और मनोवैज्ञानिक युद्ध की संज्ञा देते हैं। इसका उद्देश्य किसी देश की सेना को हराना नहीं, बल्कि उसके नागरिकों का अपने ही राष्ट्र, संस्थाओं और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा कमजोर करना होता है।

दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक अस्थिरता के दौरान कुछ समान प्रवृत्तियां दिखाई दी हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि हर आंदोलन या विरोध किसी बाहरी साजिश का हिस्सा होता है, क्योंकि लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक और आवश्यक है। लेकिन यह भी सच है कि वास्तविक समस्याओं का उपयोग दुष्प्रचार और सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा सकता है। इसलिए यह समझना जरूरी है कि किसी राष्ट्र को भीतर से कमजोर करने के लिए सामान्यतः कौन-कौन से तरीके अपनाए जाते हैं।

सबसे पहले निशाना अर्थव्यवस्था बनती है। महंगाई, बेरोजगारी, आपूर्ति संकट और आर्थिक अनिश्चितता लोगों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं। आर्थिक कठिनाई जितनी बढ़ती है, समाज उतना ही बेचैन होता जाता है। इसके बाद कोशिश होती है कि हर समस्या का दोष केवल किसी एक नीति तक सीमित न रहे, बल्कि पूरा शासन तंत्र ही असफल दिखाई देने लगे। व्यवस्था के प्रति निरंतर अविश्वास पैदा करना किसी भी अस्थिर माहौल की पहली सीढ़ी माना जाता है।

अगला चरण समाज की कमजोर कड़ियों को पहचानना होता है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, किसानों की समस्याएं, जातीय तनाव, धार्मिक विवाद, क्षेत्रीय असमानता या भाषा जैसे मुद्दे पहले से मौजूद होते हैं। यदि इनका समाधान खोजने के बजाय इन्हें लगातार भावनात्मक टकराव का विषय बनाया जाए, तो समाज धीरे-धीरे कई हिस्सों में बंटने लगता है। लोग मुद्दों पर नहीं, पहचान के आधार पर एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं।

इसके बाद ऐसे चेहरों की भूमिका बढ़ती है जो जनभावनाओं को प्रभावित कर सकें। सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र नेता, प्रभावशाली वक्ता, लोकप्रिय हस्तियां या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर किसी भी लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा हैं। लेकिन जब भावनाएं तथ्यों पर भारी पड़ने लगें और संवाद की जगह केवल उत्तेजना रह जाए, तब माहौल तेजी से बदलने लगता है।

आज सोशल मीडिया इस पूरी प्रक्रिया का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार वीडियो, संपादित तस्वीरें, बॉट नेटवर्क, ट्रेंडिंग हैशटैग और आधी-अधूरी सूचनाएं कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाती हैं। किसी छोटी घटना को राष्ट्रीय संकट और किसी अफवाह को सत्य की तरह प्रस्तुत करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है। यही कारण है कि डिजिटल साक्षरता आज राष्ट्रीय सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।

फिर अलग-अलग मुद्दों को एक साझा कथा में जोड़ने का प्रयास होता है। किसानों की मांग, छात्रों का आंदोलन, कर्मचारियों की नाराजगी, स्थानीय विवाद या सामाजिक तनाव - यदि हर विषय का निष्कर्ष एक ही राजनीतिक संदेश की ओर मोड़ दिया जाए, तो वास्तविक समस्याओं का समाधान पीछे छूट जाता है और संघर्ष ही मुख्य विषय बन जाता है।

ऐसे वातावरण में किसी एक चिंगारी का इंतजार रहता है। कोई हिंसक घटना, गिरफ्तारी, दुर्घटना या संवेदनशील विवाद अचानक पूरे देश की बहस बन जाता है। भावनाएं तथ्यों से आगे निकल जाती हैं और अफवाहें आग में घी का काम करती हैं। इसके बाद देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लेकर जाने की कोशिश होती है। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन नागरिकों के लिए यह समझना जरूरी है कि हर रिपोर्ट और हर वायरल सामग्री अंतिम सत्य नहीं होती। तथ्य और प्रचार के बीच अंतर करना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।

जब समाज में यह धारणा बनने लगे कि न्यायपालिका, संसद, चुनाव आयोग, मीडिया, पुलिस और अन्य संस्थाएं पूरी तरह निष्प्रभावी हो चुकी हैं तथा किसी सुधार की कोई संभावना नहीं बची है, तब लोकतंत्र का मनोबल कमजोर होने लगता है। संस्थाओं की आलोचना आवश्यक है, लेकिन उन्हें पूरी तरह निरर्थक घोषित कर देना लोकतांत्रिक विश्वास को भी चोट पहुंचाता है।

अंतिम चरण नागरिकों का मनोबल तोड़ना होता है। युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जाती है कि इस देश में भविष्य नहीं है, यहां अवसर समाप्त हो चुके हैं और व्यवस्था कभी नहीं सुधरेगी। जब कोई समाज स्वयं अपनी संभावनाओं पर विश्वास खो देता है, तब सबसे बड़ी हार सीमा पर नहीं, भीतर होती है।

भारत जैसा विशाल और विविध लोकतंत्र मतभेदों से नहीं, बल्कि संवाद समाप्त होने से कमजोर होता है। इसलिए न तो हर विरोध को राष्ट्रविरोध मानना उचित है और न हर असंतोष को किसी क्रांति का संकेत। नागरिकों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे हर सूचना की जांच करें, अफवाहों से बचें, तथ्य और प्रचार में अंतर करें तथा मतभेद के बावजूद राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखें।

आज देश के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि विरोध हो रहा है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इन विरोधों और असंतोषों को सुनियोजित तरीके से भारत को भीतर से कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? क्या विदेशी हितों से प्रेरित शक्तियां भारत की सामाजिक एकता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय मनोबल पर लगातार प्रहार कर रही हैं? क्या धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशें केवल संयोग हैं, या किसी बड़े खेल का हिस्सा?

इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। सतर्क रहिए, सजग रहिए, हर सूचना की पड़ताल कीजिए और उन तत्वों को पहचानिए जो समाज में अविश्वास, वैमनस्य और अस्थिरता फैलाने का काम कर रहे हैं। राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं पर नहीं होती, वह हर जागरूक नागरिक के विवेक और एकता से भी सुनिश्चित होती है।

-अपूर्व तिवारी

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