जबलपुर, 01 अगस्त।
सरकार की नीयत साफ है, योजनाएं भी बहुत हैं, लेकिन धरातल पर आदिवासी आज भी भटक रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण योजनाओं को लागू करने वाले अफसरों की लापरवाही है। जबलपुर हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि आदिवासियों की जमीन हड़पने के मामलों का एक महीने में निपटारा किया जाए और अवैध कब्जे तुरंत हटाए जाएं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि 1,196 प्रकरणों में से केवल 329 पर ही कार्रवाई क्यों हुई? आखिर बाकी फाइलें किसके इंतजार में धूल खा रही हैं?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आदिवासी कल्याण को प्राथमिकता दी है। पेसा कानून, वनाधिकार पट्टे, छात्रवृत्ति, आवास और रोजगार जैसी कई योजनाएं शुरू की गई हैं। विभिन्न मंचों से बार-बार कहा गया कि अब आदिवासी को उसका अधिकार मिलेगा। लेकिन हकीकत यह है कि तहसील और कलेक्ट्रेट के चक्कर काटते-काटते आदिवासी थक चुका है। पट्टा उसके नाम है, लेकिन जमीन पर कब्जा किसी और का है। बैंक से कर्ज नहीं मिलता, स्कूल में छात्रवृत्ति अटक जाती है और अस्पताल में पात्रता होने के बावजूद कार्ड नहीं बन पाता।
समस्या नीति की नहीं, बल्कि सिस्टम की है। कागजों पर सब कुछ दुरुस्त दिखाई देता है, लेकिन जमीन पर हालात नहीं बदलते। अधिकारी बैठकें कर लेते हैं, फोटो खिंचवा लेते हैं और फाइलें फिर वहीं की वहीं रह जाती हैं। हाईकोर्ट की फटकार के बाद कुछ जिलों में हरकत जरूर हुई है। अवैध कब्जे हटाने के आदेश भी दिए गए हैं, लेकिन यह डर के कारण की गई खानापूर्ति ज्यादा लगती है, स्थायी सुधार नहीं।
आदिवासी समाज इस प्रदेश की रीढ़ है और सरकार ने उसे मुख्यधारा में लाने का संकल्प भी लिया है। लेकिन यदि बीच में बैठा नौकरशाह ही संवेदनहीन रहेगा, तो कोई भी योजना अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकेगी। मुख्यमंत्री के निर्देश और हाईकोर्ट के आदेश, दोनों की अनदेखी केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ भी है।
सरकार को केवल योजनाएं बनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं माननी चाहिए। उनकी नियमित मॉनिटरिंग हो, हर महीने प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और आदिवासी को उसका अधिकार समय पर मिले। योजनाओं की सफलता का पैमाना सरकारी फाइलें नहीं, बल्कि लाभार्थी का जीवन होना चाहिए। यदि व्यवस्था नहीं बदली, तो अगली फटकार अदालत की नहीं, जनता की होगी और लोकतंत्र में उससे बड़ा फैसला कोई नहीं होता।
संवेदनशीलता भाषणों से नहीं, काम से साबित होती है और काम तभी होगा, जब फाइलें चलेंगी, रेंगेंगी नहीं।




















