रियाद, 18 सितंबर
मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष का दायरा अब तेजी से बढ़ता हुआ सऊदी अरब तक पहुंच गया है। ईरान के साथ चल रहे व्यापक तनाव के बीच, ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के कई महत्वपूर्ण शहरों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता की लहर दौड़ गई है।
दक्षिणी शहर और पवित्र स्थल बने निशानाहाल के दिनों में अबहा, खमीस मुशैत, जाजान और नजरान समेत दक्षिणी सऊदी शहरों को लगातार निशाना बनाए जाने की पुष्टि हुई है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार, इन हमलों की चपेट में आने से कई नागरिक घायल हुए हैं, जबकि कई आवासीय मकानों और वाहनों को भारी नुकसान पहुंचा है। खमीस मुशैत, अबहा और ताइफ में बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों के जरिए हमले किए गए हैं।
इस तनाव ने उस समय और भयावह रूप ले लिया जब सऊदी रक्षा बलों ने मक्का की दिशा में आगे बढ़ रहे एक हूती ड्रोन को हवा में ही नष्ट करने की सूचना दी। हालांकि, हूती संगठन ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया है। चूंकि मक्का दुनिया भर के मुसलमानों का सबसे पवित्र स्थल है और वहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, इसलिए इसके आसपास किसी भी प्रकार की ड्रोन गतिविधि ने इस्लामिक जगत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गहरी चिंता पैदा कर दी है।
सऊदी अरब की सैन्य जवाबी कार्रवाई और कूटनीतिक मोर्चेबंदीइन लगातार हमलों के जवाब में सऊदी अरब ने यमन के भीतर हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर अपनी हवाई और सैन्य कार्रवाई को काफी तेज कर दिया है। हूती पक्ष की ओर से बड़े पैमाने पर सऊदी हवाई हमलों का दावा किया गया है, हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
अपनी हवाई रक्षा प्रणाली और सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए सऊदी अरब ने फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र जैसे मित्र देशों से सामरिक सहायता मांगी है। अमेरिका के साथ भी इस उच्च स्तरीय सुरक्षा संकट और सैन्य सहयोग को लेकर लगातार उच्च-स्तरीय बातचीत जारी है, क्योंकि सऊदी अरब अमेरिका का एक प्रमुख रणनीतिक सहयोगी है।
तेल पाइपलाइन पर हमला और क्षेत्रीय समुद्री मार्गइस संघर्ष का सबसे गंभीर असर सऊदी अरब के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर पड़ा है। देश की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन (जो पूर्वी तेल क्षेत्रों को लाल सागर के यानबू बंदरगाह से जोड़ती है) पर ड्रोन हमला होने के बाद सुरक्षा कारणों से इसे अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, रियाद और मदीना क्षेत्रों में हुए इन ड्रोनों को इराक के हवाई क्षेत्र से भेजे जाने की बात सामने आई है। इराक ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए उच्च-स्तरीय जांच शुरू कर दी है और स्पष्ट किया है कि उसकी जमीन का इस्तेमाल किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर मंडराता खतरायह संकट केवल सऊदी अरब और यमन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर भी पड़ रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जलमार्ग पहले से ही गंभीर तनाव की चपेट में हैं। सितंबर की शुरुआत में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सऊदी स्वामित्व वाले एक तेल टैंकर पर हुए हमले में फिलीपींस के दो चालक दल के सदस्यों की मौत हो चुकी है, जिसके लिए सऊदी अरब ने सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया था।
यदि सऊदी अरब की पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रहती है, तो वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है। इसके परिणाम स्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, पेट्रोल-डीजल, विमान ईंधन (Aviation Fuel), परिवहन लागत और अंततः आम जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ने की गंभीर आशंका है।
वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति का स्वरूपविश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान घटनाक्रम को सीधे तौर पर ईरान और सऊदी अरब के बीच खुला युद्ध करार देना जल्दबाजी होगी। मौजूदा स्थिति में ईरान समर्थित हूतियों के सऊदी अरब पर हमले, यमन में सऊदी सैन्य कार्रवाई, इराक से संचालित ड्रोन गतिविधियां और तेल ढांचे पर बढ़ता दबाव—ये सभी इस व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष के भिन्न-भिन्न और जटिल पहलू हैं, जिन पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पैनी नजर बनी हुई है।
















