भोपाल, 21 सितंबर।
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी द्वारा स्कूलों में बुरका व हिजाब पर प्रतिबंध लगाने और कक्षाओं में विदेशी विद्यार्थियों की संख्या सीमित करने के निर्णय ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर इस बहस को हवा दे दी है। दुनिया भर के कई देश इस बात पर सहमत नजर आ रहे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा, आधुनिक फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक और सार्वजनिक पहचान के लिहाज से चेहरा पूरी तरह ढकना चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है। श्रीलंका और अफ्रीकी राष्ट्रों समेत कई देशों में चरमपंथियों द्वारा पहचान छिपाने के लिए इसके दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। इसके अलावा, यूरोपीय राष्ट्रों में प्रवासियों के सामाजिक एकीकरण, स्थानीय भाषा सीखने और धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस तरह के सख्त कदम उठाए जा रहे हैं, जहां फ्रांस, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड और पुर्तगाल जैसे देश पहले ही विभिन्न स्तरों पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लागू कर चुके हैं।
आंकड़ों के अनुसार, इटली के स्कूलों में विदेशी छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए मेलोनी सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि स्थानीय बच्चे अल्पसंख्यक महसूस न करें और प्रवासी मुख्यधारा की संस्कृति व भाषा को अपनाएं। दूसरी ओर, कई मुस्लिम बहुल देशों में भी सुरक्षा कारणों से ऐसे कड़े नियम प्रभावी हैं, जबकि इसके विपरीत भारत जैसे देशों में शिक्षण संस्थानों के भीतर धार्मिक पहचान और पहनावे को लेकर अक्सर कानूनी और सामाजिक विवाद देखने को मिलते हैं, जो वैचारिक मंथन का एक बड़ा विषय बना हुआ है।















