भोपाल, 6 अक्टूबर।
रामलाल के पास आयुष्मान कार्ड है। सरकार ने कहा था कि अब पांच लाख रुपये तक मुफ्त इलाज मिलेगा, लेकिन जब वह अपने बच्चे को लेकर भोपाल के निजी अस्पताल पहुंचा तो जवाब मिला कि आयुष्मान से इलाज बंद है। आठ अक्टूबर से योजना के तहत इलाज नहीं मिलेगा। रामलाल जैसी कहानी आज हजारों गरीबों की है, जिनकी जेब में कार्ड है, लेकिन अस्पताल के दरवाजे बंद हैं। मध्य प्रदेश में सरकार और निजी अस्पतालों के बीच लड़ाई चल रही है और इस लड़ाई में पिस रही है आम जनता।
सरकार ने आयुष्मान योजना में एनएबीएच मान्यता की शर्त अनिवार्य कर दी है। साथ ही कई सख्त नियम लगाए गए हैं और भुगतान की प्रक्रिया को कठिन बना दिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे गुणवत्ता सुधरेगी और फर्जीवाड़ा रुकेगा, लेकिन निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि एनएबीएच की मान्यता लेना आसान नहीं है। इसके लिए लाखों रुपये का खर्च चाहिए, बड़ा भवन चाहिए और भारी स्टाफ चाहिए। छोटे शहरों और कस्बों के अस्पताल यह सब कहां से लाएंगे? भोपाल के निजी अस्पताल संघ के अध्यक्ष डॉ. विशाल सिंह बघेल ने साफ कहा है कि लंबे समय से भुगतान अटका हुआ है और नीतिगत विसंगतियों के कारण अस्पताल चलाना मुश्किल हो गया है।
निजी अस्पतालों की सबसे बड़ी पीड़ा लंबित भुगतान है। अस्पताल मरीज का इलाज कर देता है, फाइल भेज देता है, लेकिन महीनों तक पैसा नहीं आता। कभी छोटी-सी गलती बताकर पूरा क्लेम रोक दिया जाता है तो कभी बार-बार आपत्ति लगाकर फाइल लौटा दी जाती है। अस्पताल को डॉक्टर को वेतन देना है, नर्स को वेतन देना है, दवा कंपनी को पैसा देना है और बिजली का बिल भी भरना है। अगर सरकार समय पर पैसा नहीं देगी तो अस्पताल कैसे चलेगा? इसका सीधा असर मरीज पर पड़ता है। अस्पताल कहता है कि पहले नकद जमा करो, फिर इलाज होगा और गरीब मरीज बिना इलाज के लौट जाता है।
सरकार ने कई बीमारियों के पैकेज की दरें बहुत कम कर दी हैं। निजी अस्पतालों का कहना है कि उन दरों में इलाज करना संभव नहीं है। एक ऑपरेशन में जांच, दवा, एनेस्थीसिया और डॉक्टर की फीस मिलाकर खर्च पैकेज से दोगुना हो जाता है। अगर अस्पताल को हर मरीज पर घाटा होगा तो वह आयुष्मान के मरीज को क्यों भर्ती करेगा? यही कारण है कि अस्पताल अब आयुष्मान के मरीजों को टालने लगे हैं। वे सीधे मना नहीं करते, बल्कि कहते हैं कि बेड नहीं है, डॉक्टर नहीं है या मशीन खराब है। लेकिन सच यह है कि उन्हें सस्ते पैकेज में इलाज करना मंजूर नहीं है और इसका खामियाजा जनता भुगत रही है।
जब निजी अस्पताल आयुष्मान से इलाज करने से मना करते हैं तो गरीब मरीज सरकारी अस्पताल की ओर भागता है, लेकिन वहां पहले से ही भीड़ है। एक-एक डॉक्टर के पास सैकड़ों मरीज हैं, जांच के लिए महीनों की प्रतीक्षा है और दवाओं की कमी है। ऐसे में गंभीर मरीज कहां जाएगा? हृदय रोगी को तुरंत इलाज चाहिए, कैंसर के मरीज को समय पर कीमोथेरेपी चाहिए और दुर्घटना में घायल को तत्काल ऑपरेशन चाहिए। अगर समय पर इलाज नहीं मिला तो जान जा सकती है। आयुष्मान योजना इसी जान को बचाने के लिए बनी थी, लेकिन आज वही जान जोखिम में है, क्योंकि सरकार और निजी अस्पताल आमने-सामने हैं।
निजी अस्पताल संचालक अब अपनी बात दिल्ली तक ले जाने की तैयारी में हैं। वे केंद्र सरकार से मिलकर अपनी पीड़ा बताना चाहते हैं कि वास्तविक उपचार के बावजूद क्लेम रोकना उचित नहीं है और एनएबीएच जैसी शर्तें व्यवहारिक नहीं हैं। उन्होंने कहा है कि जब तक संतोषजनक समाधान नहीं होगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा और आयुष्मान के तहत एकजुट होकर इलाज नहीं किया जाएगा। एक हजार एंबुलेंस के साथ कुछ बड़े अस्पताल संचालकों ने अपनी जिम्मेदारी के साथ-साथ अपनी बात रखने का फैसला किया है। लेकिन यह लड़ाई चाहे दिल्ली तक जाए, इसका दर्द तो भोपाल और मध्य प्रदेश की जनता ही झेल रही है।
आयुष्मान योजना केवल एक कार्ड नहीं है। यह गरीब का भरोसा है कि बीमारी में सरकार उसके साथ है। जब अस्पताल में कहा जाता है कि आयुष्मान नहीं चलेगा तो यह भरोसा टूट जाता है। गरीब सोचता है कि योजना केवल टीवी और पोस्टर में है, जमीन पर कुछ नहीं। कई मरीज तो शर्म के मारे दोबारा अस्पताल ही नहीं जाते और घर पर ही दर्द सहते रहते हैं। कई लोग कर्ज लेकर इलाज कराते हैं और फिर कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। सरकार और निजी अस्पतालों की इस लड़ाई में गरीब की थाली से रोटी भी छिन रही है और जेब से पैसा भी। जनता पूछ रही है, समाधान कहां है?
जनता का सवाल सीधा है कि जब सरकार ने योजना शुरू की थी तो निजी अस्पतालों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया? और अगर अस्पताल फर्जीवाड़ा कर रहे थे तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? पूरे सिस्टम को बंद करना समाधान नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह एनएबीएच की शर्त को चरणबद्ध तरीके से लागू करे, छोटे अस्पतालों को मदद दे, भुगतान की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाए और पैकेज दरों को व्यवहारिक बनाए, ताकि अस्पताल को घाटा न हो। निजी अस्पतालों को भी चाहिए कि वे मरीज को बंधक न बनाएं, फर्जीवाड़ा करने वालों का साथ न दें और ईमानदारी से योजना को चलाएं। स्वास्थ्य सेवा कोई व्यापार नहीं है, यह जीवन बचाने का मिशन है। इस मिशन में सरकार और निजी अस्पताल दोनों को साथ चलना होगा। अगर दोनों लड़ेंगे तो मरेगा तो आम आदमी ही।
आयुष्मान योजना को कागजों से निकालकर जमीन पर लाना होगा, भुगतान समय पर करना होगा और अस्पतालों की समस्याओं को सुनना होगा। तभी रामलाल जैसे हजारों लोगों के हाथ में जो कार्ड है, वह सच में वरदान बनेगा। वरना वह कार्ड केवल जेब में पड़ा एक कागज बनकर रह जाएगा और जनता की परेशानी बढ़ती ही जाएगी।














