भोपाल, 07 अक्टूबर।
कभी किसान केवल खेत में हल चलाता था, आज किसान खुद कंपनी चला रहा है। कभी किसान अपनी फसल को औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर था, आज वही किसान अपनी दाल का ब्रांड बनाकर बाजार में बेच रहा है। यह कहानी है नौ गांवों के 1,637 किसानों की, जिन्होंने पांच साल में 1 करोड़ 39 लाख रुपये का कारोबार करके दिखा दिया है। यह कहानी है एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठन की ताकत की और जैविक खेती तथा सामूहिक विपणन से खेती को फायदे का सौदा बनाने की।
पांच साल पहले यह सफर केवल 26 लाख रुपये से शुरू हुआ था। फिर 40 लाख, फिर 1 करोड़ 29 लाख रुपये की जबरदस्त उछाल और फिर 1 करोड़ 31 लाख और अब 1 करोड़ 39 लाख रुपये तक पहुंच गया है। यह ग्राफ केवल रुपयों का नहीं है, यह भरोसे का ग्राफ है। यह उस सोच का ग्राफ है कि जब किसान अकेला नहीं, बल्कि समूह में काम करता है तो उसकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। कोरली क्षेत्र के 49 गांवों में यह प्रयोग शुरू हुआ था। 37 किसानों ने इसी सोच को पूंजी बनाया और जैविक खेती की राह पकड़ी। हाथ चक्की से अरहर की दाल तैयार करती महिलाएं इस बदलाव की सबसे बड़ी गवाह हैं।
एफपीओ का सबसे बड़ा मंत्र है, उपज से बीज तक अपना कारोबार, यानी बीज भी अपना और बाजार भी अपना। मई 2021 से शुरू हुई इस यात्रा में एफपीओ ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ किसानों को बाजार उपलब्ध कराने का काम किया है। संगठन हाथ चक्की की दाल, जैविक गुड़ तथा रबी-खरीफ फसलों के बीज का उत्पादन कर रहा है। पिछले दो वर्षों से शासन की ओर से उपार्जन का काम भी मिला है। यह केवल खेती नहीं है, यह एक संपूर्ण बिजनेस मॉडल है, जहां किसान ही उत्पादक है, किसान ही प्रोसेसर है और किसान ही विक्रेता है। बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई है और मुनाफा सीधे किसान की जेब में जा रहा है।
पिछले साल एफपीओ ने पहली बार अपने सदस्य किसानों को प्रति सदस्य 500 रुपये की दर से कुल 8 लाख 18 हजार 500 रुपये का लाभांश वितरित किया। यह केवल आर्थिक मुनाफा नहीं, बल्कि इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था कि सामूहिक शक्ति से खेती को एक सफल बिजनेस में बदला जा सकता है। जब किसान को साल के अंत में लाभांश मिलता है तो उसका भरोसा और बढ़ता है। वह और अधिक जैविक खेती की ओर प्रेरित होता है और संगठन से जुड़ने के लिए अन्य किसानों को भी प्रेरित करता है।
कृषि विभाग के अनुसार, जिले में खेती के क्षेत्र में विपणन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किसान उत्पादक संगठन बनाए जा रहे हैं। जिले में अब 18 एफपीओ काम कर रहे हैं। इनमें विभिन्न क्षेत्रों के किसान हैं और मटर, दाल, गुड़ सहित अन्य कृषि उत्पादों के उत्पादन और विपणन पर काम कर रहे हैं। एफपीओ यानी किसान उत्पादक संगठन में किसान सामूहिक रूप से काम करते हैं। साझे संसाधनों, प्रसंस्करण और विपणन पर मिलकर काम करने से खरीद और बिक्री में किसानों को बेहतर मूल्य लेने के मौके मिलते हैं और लागत कम होती है।
इस सफलता की जड़ में जैविक खेती है। जब रासायनिक खादों ने जमीन को बंजर बना दिया था, तब इन किसानों ने जैविक खेती की ओर लौटने का फैसला किया। जैविक विपणन से पांच साल में 26 लाख से बढ़कर 1 करोड़ 39 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल करना यह बताता है कि बाजार में जैविक उत्पादों की कितनी मांग है। लोग अब जहरमुक्त खाना चाहते हैं और उसके लिए अधिक पैसा देने को भी तैयार हैं। एफपीओ ने इसी मांग को समझा और जैविक गुड़, जैविक दाल और जैविक बीज पर फोकस किया। यही कारण है कि आज उनकी दाल, मसूर और सोयाबीन की खरीदी भी हो रही है।
इस कहानी में सबसे सुंदर पहलू महिलाओं की भागीदारी है। तस्वीर में दिख रही महिलाएं हाथ चक्की से दाल साफ करती हुई केवल मजदूर नहीं हैं, वे इस एफपीओ की मालकिन हैं। जब महिलाएं समूह में आती हैं तो वे न केवल अपनी आय बढ़ाती हैं, बल्कि पूरे गांव की सोच बदल देती हैं। उन्होंने अरहर की दाल का प्रसंस्करण अपने हाथ में लिया और उसकी गुणवत्ता को इतना अच्छा रखा कि बाजार में उसकी मांग बढ़ गई। यह महिला सशक्तीकरण का सबसे जीवंत उदाहरण है, जहां चूल्हे से निकलकर महिलाएं अब कारोबार संभाल रही हैं।
अकेला किसान कमजोर है, लेकिन जब 1,637 किसान एक साथ आते हैं तो वे एक कंपनी बन जाते हैं। वे एक साथ बीज खरीदते हैं तो सस्ता मिलता है। वे एक साथ ट्रांसपोर्ट करते हैं तो खर्च कम होता है। वे एक साथ मोलभाव करते हैं तो बेहतर दाम मिलता है। यही सामूहिकता का अर्थशास्त्र है, जो एफपीओ ने सिखाया है। पहले किसान को साहूकार से कर्ज लेना पड़ता था, अब एफपीओ के माध्यम से उसे सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिल जाता है। यह आर्थिक आजादी ही असली आजादी है।
सरकार ने एफपीओ को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। किसानों को एनएबीएच जैसी जटिल प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि आसान लाइसेंस और बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है। जिले के 18 एफपीओ को अगर सही मार्गदर्शन और बाजार लिंकेज मिले तो वे भी एक करोड़ से अधिक का कारोबार कर सकते हैं। जरूरत है कि शासन की ओर से उपार्जन के साथ-साथ प्रोसेसिंग यूनिट और ब्रांडिंग में भी मदद दी जाए, ताकि किसान की दाल और गुड़ केवल स्थानीय बाजार में नहीं, बल्कि बड़े शहरों के मॉल में भी बिके।
नौ गांवों के 1,637 किसानों ने यह दिखा दिया है कि खेती घाटे का सौदा नहीं है। अगर उसे सही तरीके से किया जाए तो वह सबसे बड़ा फायदे का सौदा है। पांच साल में कई गुना वृद्धि यह बताती है कि जब नीयत साफ हो और इरादा मजबूत हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। यह कहानी हर गांव के लिए प्रेरणा है कि वे भी अपने एफपीओ बनाएं, जैविक खेती अपनाएं और अपनी उपज को खुद बाजार में बेचें। तभी किसान अन्नदाता से उद्यमी बनेगा और तभी गांव आत्मनिर्भर बनेगा। यही असली आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर है, जहां किसान खुद अपना मालिक है।














