भोपाल, 06 अक्टूबर।
एक तरफ सरकार और जिला प्रशासन बड़े मंचों से दावा करता है कि शहरों को भिखारी मुक्त कर दिया गया है। पोस्टर लगाए जाते हैं कि भिक्षावृत्ति समाप्त हो गई है, पुनर्वास हो गया है और शहर अब स्वच्छ एवं व्यवस्थित है। लेकिन राजधानी में ही हर चौराहे पर हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। सुबह से शाम तक बुजुर्ग, युवा और छोटे-छोटे बच्चे भीख मांगते नजर आते हैं। वे गाड़ियों के शीशे खटखटाते हैं, हाथ फैलाते हैं और कई बार तो गाड़ियों के सामने तक आ जाते हैं। यह उसी शहर का दृश्य है, जहां से भिखारी मुक्त करने का दावा करने वाले अधिकारी रोज गुजरते हैं।
पहले चौराहों पर जाम का कारण अतिक्रमण या सिग्नल की खराबी माना जाता था, लेकिन अब भिखारियों की भीड़ भी यातायात के लिए परेशानी बन रही है। लाल बत्ती होते ही दस से पंद्रह लोग गाड़ियों के बीच पहुंच जाते हैं। कोई गोद में बच्चा लिए है तो कोई लाठी के सहारे खड़ा है। इससे यातायात बाधित होता है और दुर्घटना का खतरा भी बढ़ता है। कई बार भीख न देने पर अभद्रता की शिकायतें भी सामने आती हैं।
इस पूरी स्थिति में यातायात पुलिस की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। चौराहों से कुछ ही दूरी पर हेलमेट और सीट बेल्ट की जांच होती है, चालान काटे जाते हैं, लेकिन सड़क के बीच यातायात बाधित करते लोग नजर नहीं आते। क्या हेलमेट न पहनना ही अपराध है और यातायात बाधित करना नहीं? पुलिस की जिम्मेदारी केवल चालान काटना नहीं, यातायात को सुगम बनाना भी है।
भिखारी मुक्त अभियान का उद्देश्य केवल कुछ लोगों को पकड़कर आश्रय गृह में रखना और फोटो खिंचवाना नहीं हो सकता। स्थायी पुनर्वास, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार की व्यवस्था के बिना वे फिर चौराहों पर लौटेंगे। गरीबी, बेरोजगारी और मानव तस्करी जैसे कारणों पर काम किए बिना यह समस्या खत्म नहीं होगी।
चौराहों पर भीख मांगते बच्चे स्कूल में, बुजुर्ग आश्रय में और युवा रोजगार में होने चाहिए। शहर को भिखारी मुक्त करने का दावा करना आसान है, लेकिन उसे हकीकत में बदलने के लिए ईमानदार और निरंतर प्रयास जरूरी हैं। जब तक फाइलों के दावे जमीन की हकीकत से नहीं मिलेंगे, तब तक राजधानी की चमक अधूरी ही रहेगी।













