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संपादकीय
07 Oct, 2026

कैश फ्लो का चमकता झूठ और निवेशक की आंखों में धूल

कंपनी के कैश फ्लो को समझे बिना निवेश करना जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि कर्ज, गलत लेखांकन और भुगतान टालने से नकदी की तस्वीर बदली जा सकती है।

नई दिल्ली, 07 अक्टूबर।

सुनने में हैरानी हो सकती है, लेकिन आज निवेश की दुनिया में एक नया चलन शुरू हुआ है। कंपनी के मुनाफे से ज्यादा उसकी जेब में पड़ी नकदी को देखा जा रहा है और यही नकदी अब नया जाल बन गई है। ज्यादातर निवेशक कंपनी की नकदी यानी कैश पर भरोसा करने लगे हैं, लेकिन तगड़ा कैश कमजोर बिजनेस को भी मजबूत दिखा सकता है। यह पैमाना निवेशकों के लिए धोखा साबित हो सकता है। कैश फ्लो स्टेटमेंट यानी सीएफएस बताता है कि कंपनी में असल में कितना पैसा आया और गया। इसके तीन हिस्से हैं, रोज के कारोबार से आने वाली नकदी, संपत्ति और निवेश से जुड़ी नकदी तथा कर्ज और शेयर से जुटाई गई रकम और उसका खर्च। बिक्री से आने वाली रकम, इन्वेस्टिंग, फाइनेंसिंग और ऑपरेटिंग के खेल को समझे बिना निवेश करना अंधेरे में तीर चलाने जैसा है। सिर्फ तगड़ी नकदी देखकर निवेश करना सबसे जोखिम भरा फैसला हो सकता है।

भारत में कैश फ्लो स्टेटमेंट चमकाने के वे आम तरीके, जो ऑडिटरों की पकड़ में अमूमन आ जाते हैं, उन्हें समझना बहुत जरूरी है। भारत में कई कंपनियां सिर्फ तगड़ी नकदी के आधार पर निवेशकों को लुभाती हैं और यह निवेशक के लिए सबसे जोखिम भरा फैसला बन जाता है। कंपनी की असली ताकत उसके बिजनेस से आने वाले पैसे में होती है, न कि उधार लिए गए पैसे में या कागजों पर बढ़ाई गई कीमत में। अगर कोई कंपनी बार-बार यह दिखाती है कि उसके पास बहुत कैश है, लेकिन उसका बिजनेस वैसा नहीं है, तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं गड़बड़ी है। यही गड़बड़ी बाद में बड़े घोटाले का रूप ले लेती है।

ऑपरेटिंग कैश फ्लो को फुलाना सबसे आसान और आम तरीका है। इसके लिए कंपनियां कई तरह के हथकंडे अपनाती हैं। कभी कर्ज या अनुदान की रकम को गलत खाते में डाल दिया जाता है, कभी कागजी बढ़ोतरी को नकदी बता दिया जाता है तो कभी सप्लायर का भुगतान टालकर अपनी जेब में पैसा दिखाया जाता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि कर्ज या अनुदान की रकम गलत खाते में डालने या सप्लायर का भुगतान टालने से ऑपरेटिंग कैश फ्लो यानी सीएफओ को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा सकता है। सरकारी ऑडिट में कई बार ऐसे मामले पकड़े गए हैं, लेकिन कई बार निवेशक इस चमक में आकर अपना पैसा गंवा देता है।

पांच मामलों ने कैश के इस खेल की पोल खोली है। पहला मामला इन्फो ड्राइव सॉफ्टवेयर का है। इस कंपनी ने कैश फ्लो स्टेटमेंट में 62 करोड़ का आउटफ्लो दिखाया, पर नकदी में गिरावट सिर्फ 16,700 रुपये की दिखी। एक निवेश 60 करोड़ दिखाया गया, लेकिन गणना में वह 24 करोड़ ही निकला। इस गड़बड़ी को बीओडी इंडिया की फॉरेंसिक ऑडिट ने पकड़ा और सेबी ने 2021 में कार्रवाई की। दूसरा मामला एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी का है। यहां सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से मिला 640 करोड़ रुपये का अनुदान फाइनेंसिंग में दिखाया गया, जबकि यह निवेश था। इसे कैग ने 2023-24 में पकड़ा। तीसरा मामला वीबी इंडस्ट्रीज का है। कर्ज देना ही बिजनेस था, फिर भी 2 करोड़ रुपये का ब्याज फाइनेंसिंग में दिखाया गया। कैश फ्लो दिखाए गए आंकड़ों से कम रहा। इसे सेबी ने 2016-18 में पकड़ा। चौथा मामला भारत इम्यूनोलॉजिकल एंड बायोलॉजिकल कॉरपोरेशन का है। यहां अधूरे प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट की कागजी कीमत बढ़ाई गई और 31.68 करोड़ रुपये ऑपरेटिंग कैश में जोड़े गए। इससे 19.90 करोड़ रुपये का आउटफ्लो और 11.82 करोड़ रुपये का इनफ्लो नजर आया। इसे वैधानिक ऑडिटर ने 2020-21 में पकड़ा। पांचवां मामला आईईएफसीसीआई की सहायक कंपनी का है। यहां गलतियों से ऑपरेटिंग कैश फ्लो 9.75 करोड़ रुपये से ज्यादा दिखा, जो दर्ज ऑपरेटिंग इनफ्लो 12 करोड़ रुपये का करीब 82 प्रतिशत था। इसे कैग ने 2024 में पकड़ा।

इन मामलों में एक बात सामान्य है कि कैश गायब नहीं हुआ, बल्कि कहानी बदल दी गई। एनटीपीसी ग्रीन एनर्जी में अनुदान सही था, गलती सिर्फ मद की थी। सुधार के बाद फाइनेंसिंग इनफ्लो 7,671 करोड़ रुपये और इन्वेस्टिंग आउटफ्लो 9,207 करोड़ रुपये रह गया। इन्फो ड्राइव ने सेबी को जो स्टेटमेंट दिया, वह बीएसई पर मौजूद स्टेटमेंट से अलग था। यह दिखाता है कि कंपनियां दो तरह के आंकड़े रख सकती हैं, एक सेबी के लिए और एक बाजार के लिए। निवेशक को दोनों को मिलाकर देखना चाहिए।

मान लीजिए कि दो अलग-अलग कंपनियों के पास साल में 500 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी आई। एक ने बिजनेस से कमाई की और दूसरी ने बैंक से उधार लिया। दूसरी कंपनी पर कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ा। इस तरह 100 करोड़ रुपये का मुनाफा बताने वाली कंपनी का सीएफओ सिर्फ 30 करोड़ रुपये रह गया। यही गौर करने वाली बात होती है। पूंजीगत खर्च की तुलना करना भी जरूरी है। कंपनी ने कर्ज लेकर एडवांस में कारोबारी मकसद पूरा किया है या नहीं, वसूली और भुगतान के दिनों के कई साल के आंकड़ों की तुलना करें। कुल मुनाफा यानी पीएटी और चार-पांच साल के कुल सीएफओ को मिलाएं। रिसीवेबल, इन्वेंट्री, देनदारी और एडवांस अलग-अलग देखें। कर्ज में बदलाव को फाइनेंसिंग से मिलाएं और सालाना कैश फ्लो में यह देखना जरूरी है कि ज्यादातर नकदी सच में कहां से आई है।

निवेशक के लिए एक आसान चेकलिस्ट है। चार-पांच साल का कुल सीएफओ और कुल मुनाफा मिलाएं। अगर मुनाफा ज्यादा है और कैश कम है तो गड़बड़ हो सकती है। रिसीवेबल, इन्वेंट्री, देनदारी और एडवांस अलग-अलग देखें। अगर रिसीवेबल बहुत बढ़ रहा है तो कंपनी अपना सामान उधार बेच रही है। कर्ज में बदलाव को फाइनेंसिंग से मिलाएं। अगर कर्ज बढ़ रहा है और ऑपरेटिंग कैश भी बढ़ रहा है तो हो सकता है कि कर्ज को ऑपरेटिंग में दिखाया जा रहा हो। सालाना कैश फ्लो में यह देखना जरूरी है कि ज्यादातर नकदी सच में कहां से आई है। क्या वह ग्राहकों से आई है या बैंक से? वसूली और भुगतान के दिनों के कई साल के आंकड़ों की तुलना करें। अगर कंपनी अचानक अपने सप्लायर को देर से पैसा दे रही है तो वह अपने कैश को फुला रही हो सकती है।

आज बाजार में कई ऐसी कंपनियां हैं जो कागज पर अमीर दिखती हैं, लेकिन हकीकत में उनकी जेब खाली है। वे अपने सप्लायर को पैसा नहीं देतीं और उसे अपना कैश बताती हैं। कुछ कंपनियां अपने प्रॉपर्टी प्रोजेक्ट की कीमत बढ़ाकर उसे कैश में जोड़ देती हैं। इससे निवेशक को लगता है कि कंपनी के पास बहुत पैसा है, लेकिन जब कंपनी को सच में पैसे की जरूरत होती है, तब पता चलता है कि वह पैसा तो केवल कागजों में था। यह खेल लंबे समय तक नहीं चलता है। एक न एक दिन सच्चाई सामने आ ही जाती है और तब निवेशक का पैसा डूब जाता है।

इसलिए निवेशक को चमक-दमक से बचना चाहिए और गहराई में जाना चाहिए। निवेशक की समझदारी ही असली सुरक्षा है। कैश फ्लो एक बहुत ही ताकतवर औजार है, लेकिन अगर उसे गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो वह धोखा भी बन सकता है। निवेशक को चाहिए कि वह केवल तगड़ी नकदी के आधार पर किसी कंपनी में निवेश न करे, बल्कि उसकी पूरी कहानी समझे, उसकी ऑडिट रिपोर्ट पढ़े और उसके पिछले रिकॉर्ड को देखे। तभी वह अपने पैसे को सुरक्षित रख सकता है। वरना कागज पर करोड़ों दिखाने वाली कंपनी हकीकत में निवेशक को कंगाल बना सकती है। याद रखिए, सच्चा सोना वही है जो आग में तपकर निकले, न कि जो केवल पॉलिश करके चमकाया गया हो। भारत में कैश फ्लो स्टेटमेंट चमकाने के वे आम तरीके, जो ऑडिटरों की पकड़ में अमूमन आ जाते हैं, उनसे बचकर ही निवेशक अपनी गाढ़ी कमाई को बचा सकता है।

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आज का राशिफल

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