भोपाल, 07 अक्टूबर।
मध्य प्रदेश में नशे के खिलाफ लड़ाई कोई नई नहीं है। यह लड़ाई वर्षों से चल रही है। कभी किसी पूर्व मुख्यमंत्री ने मंच से शराबबंदी की बात कही तो कभी किसी गांव में महिलाओं के समूह ने शराब की दुकान पर ताला लगाने की कोशिश की। कभी युवाओं ने ज्ञापन दिया तो कभी संत समाज ने नशे को अभिशाप बताया। लेकिन हर बार यह लड़ाई कुछ दिन की हलचल के बाद शांत हो जाती थी। कारण साफ था कि नारे बहुत थे, लेकिन कोई ठोस योजना नहीं थी, कोई समय सीमा नहीं थी और कोई साझा रोडमैप नहीं था। अब डॉ. मोहन यादव सरकार ने इस लड़ाई को नारे से निकालकर संकल्प में बदलने की दिशा में पहला सधा हुआ कदम उठाया है और केंद्र के साथ मिलकर 31 दिसंबर 2029 तक मध्य प्रदेश को नशा मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है।
इस जन आंदोलन की असली नायिका गांव की महिलाएं हैं, जिन्होंने सबसे पहले नशे का दर्द समझा। शराबी पति की मार सहने वाली महिला ही जानती है कि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को बर्बाद करता है। मध्य प्रदेश के कई जिलों में महिलाओं ने समूह बनाकर शराब की दुकानों का विरोध किया। कई जगह उन्होंने खुद पहरा दिया कि कोई युवा शराब लेकर गांव में न आए। यह आंदोलन किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि पीड़ा से निकला था। लेकिन अकेली महिलाएं कब तक लड़तीं? उन्हें प्रशासन और सरकार के साथ की जरूरत थी। अब जाकर यह साथ मिलता दिख रहा है।
लंबे समय से मध्य प्रदेश में नशाबंदी की मांग उठती रही है। कई पूर्व मुख्यमंत्रियों ने इस दिशा में घोषणाएं भी कीं, लेकिन घोषणाएं फाइलों में ही अटकी रहीं। कभी कहा गया कि चरणबद्ध तरीके से नशाबंदी होगी तो कभी कहा गया कि जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, लेकिन जमीन पर नशे का कारोबार बढ़ता रहा। नई-नई तरह की नशीली चीजें बाजार में आ गईं। पहले केवल शराब और गांजे तक सीमित यह जहर अब सिंथेटिक ड्रग्स तक पहुंच गया है। मेफेड्रोन जैसी खतरनाक ड्रग्स बनाने वाली अवैध फैक्ट्रियां और गुप्त प्रयोगशालाएं भोपाल के जगदीशपुर जैसे इलाकों में पकड़ी गई हैं। यह इस बात का सबूत है कि नशे के सौदागरों ने अपना जाल कितना गहरा फैला दिया है।
भारत की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ करने की दिशा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दृष्टिकोण सदैव स्पष्ट और परिणामोन्मुखी रहा है। जिस प्रकार कठोर इच्छाशक्ति और सटीक रणनीति के साथ देश में नक्सलवाद के नेटवर्क को ध्वस्त किया गया और मध्य प्रदेश के बालाघाट जैसे क्षेत्रों को नक्सल मुक्त घोषित किया गया, उसी दृढ़ता की आवश्यकता आज युवा पीढ़ी को खोखला कर रही नशे की महामारी से निपटने के लिए है। गृह मंत्री जब कोई बात कहते हैं तो मानना चाहिए कि उसकी समूची क्रियान्वयन योजना उनके हाथ में है। भोपाल प्रवास के दौरान गृह मंत्री द्वारा मध्य प्रदेश को नशीले पदार्थों के चंगुल से मुक्त कराने की दिशा में केंद्र और राज्य के साझा रोडमैप की घोषणा एक नई उम्मीद जगाती है।
पहली बार नशा मुक्ति के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की गई है। 31 दिसंबर 2029 तक मध्य प्रदेश को पूरी तरह नशा मुक्त बनाने की घोषणा यह बताती है कि अब यह लड़ाई केवल भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक निश्चित लक्ष्य के तहत लड़ी जाएगी। नशा मुक्ति के लिए ऐसी स्पष्ट कार्ययोजना का बनना समय की सबसे बड़ी मांग है। आंकड़े बताते हैं कि समस्या अब केवल तस्करी या सेवन तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रदेश में सिंथेटिक ड्रग्स बनाने वाली अवैध फैक्ट्रियों का जाल भी सामने आया है। ऐसे में केंद्र और राज्य की संयुक्त कार्ययोजना, कड़ा खुफिया तंत्र और कठोर कानूनी शिकंजा ही इस संगठित अपराध की कमर तोड़ सकता है।
डॉ. मोहन यादव सरकार ने इस बार जल्दबाजी नहीं की है। उसने धीरे-धीरे सधे कदमों से आगे बढ़ने की रणनीति अपनाई है। जागरूकता, नेटवर्क की पहचान, कठोर कार्रवाई और युवाओं को विकल्प देना, सरकार ने केवल कानून-व्यवस्था पर ही बात नहीं की, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण के कई अहम सूत्र भी जोड़े हैं। नए आपराधिक कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन पर यह कहना कि आने वाले समय में एफआईआर से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक का न्याय चक्र तीन साल में पूरा होगा, अपराधियों में कानून का खौफ पैदा करने और पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम है। जब अपराधी को पता होगा कि सजा जल्दी मिलेगी तो वह अपराध करने से पहले सौ बार सोचेगा।
युवा पीढ़ी को बचाना है तो रोजगार देना होगा। नशा मुक्ति का सबसे बड़ा हथियार रोजगार है। खाली हाथ और खाली दिमाग ही नशे की ओर जाता है। जब युवा के पास काम नहीं होता तो वह गलत संगत में फंस जाता है और नशे का शिकार हो जाता है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह नशा मुक्ति अभियान के साथ-साथ कौशल विकास, स्वरोजगार और खेल गतिविधियों को भी जोड़े। सीएम यूथ कॉन्क्लेव जैसे आयोजनों में युवाओं को एआई, रोबोटिक्स, ड्रोन और स्टार्टअप से जोड़ना इसी दिशा में एक अच्छा कदम है। जब युवा अपने भविष्य को लेकर व्यस्त होगा तो उसे नशे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
अब समय आ गया है कि नशे के खिलाफ चल रहे जन आंदोलन को जन भागीदारी में बदला जाए। हर गांव में नशा मुक्ति समिति बने, हर स्कूल में नशे के खिलाफ पाठ पढ़ाया जाए, हर पंचायत में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो और हर जिले में नशा मुक्ति केंद्र को मजबूत किया जाए। पुलिस केवल पकड़ने का काम करे, लेकिन सुधार का काम समाज करे। जब समाज और सरकार एक साथ आएंगे तभी यह लड़ाई जीती जा सकती है। मध्य प्रदेश ने नक्सलवाद के खिलाफ ऐसी ही एकजुटता दिखाई थी और सफलता पाई थी। अब वही एकजुटता नशे के खिलाफ दिखानी होगी।
रवींद्रनाथ ठाकुर की पंक्ति, "आस्था वह पक्षी है जो अंधकार में भी उजाले को देख लेता है", आज मध्य प्रदेश के लिए प्रेरणा है। नशे का अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, लेकिन अगर आस्था और इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उजाला जरूर आता है। मध्य प्रदेश के नशे से मुक्ति की ओर बढ़ते कदम इस उजाले की पहली किरण हैं। लंबे समय से चल रहे आंदोलनों को अब एक दिशा मिली है, महिलाओं के आंसुओं को अब एक सहारा मिला है और युवाओं के सपनों को एक नई उम्मीद मिली है। जरूरत है कि हम सब इस संकल्प में शामिल हों और अपने घर से इसकी शुरुआत करें, क्योंकि नशा मुक्त मध्य प्रदेश केवल सरकार का नहीं, बल्कि हर नागरिक का सपना होना चाहिए।














