भोपाल, 06 अक्टूबर।
देश के गृह मंत्री अमित शाह की गरिमामय उपस्थिति में प्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव ने जब सहकार से समृद्धि का शंखनाद किया, तो वह केवल एक सरकारी घोषणा नहीं थी, बल्कि मध्य प्रदेश की साढ़े आठ करोड़ जनता के लिए एक नए युग का आरंभ था। यह संकल्प दुग्ध क्रांति का है, गांव की समृद्धि का है, जहर मुक्त थाली का है और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का भी है। अब समय आ गया है कि सरकार के साथ-साथ हर नागरिक भी इस महाअभियान में शामिल हो।
गुजरात ने सहकारिता के बल पर श्वेत क्रांति करके दुनिया को दिखा दिया कि जब किसान एक साथ आता है तो क्या चमत्कार हो सकता है। वही चमत्कार अब मध्य प्रदेश में दोहराने की तैयारी है। मध्य प्रदेश में दूध की अपार संभावनाएं हैं। यहां के गांवों में आज भी हर घर में गाय पाली जाती है। जरूरत है कि इसे वैज्ञानिक तरीके से सहकारिता से जोड़ा जाए। जब गांव में दुग्ध सहकारी समितियां बनेंगी तो किसान को अपने दूध का सही दाम मिलेगा, बिचौलिया खत्म होगा और गांव का पैसा गांव में ही रहेगा। यह श्वेत क्रांति का दूसरा अध्याय होगा, जिसका केंद्र मध्य प्रदेश बन सकता है।
अभी तक हम गोपालन को केवल दूध तक सीमित रखते थे, लेकिन इस अभियान ने गोपालन को पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बनाने की संभावना पैदा की है। एक गाय केवल दूध ही नहीं देती, वह गोबर देती है, गोमूत्र देती है और समृद्धि के अनेक रास्ते खोलती है। जब गांव में गोपालन बढ़ेगा तो दूध के साथ घी, मक्खन, पनीर, खोवा और छाछ जैसे उत्पाद भी गांव में ही बनेंगे। इससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार मिलेगा, महिलाओं को स्वरोजगार मिलेगा और गांव शहरों पर निर्भर नहीं रहेगा। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक भी होगा। जब किसान समृद्ध होगा तो गांव समृद्ध होगा और जब गांव समृद्ध होगा तो प्रदेश समृद्ध होगा।
आज बाजार में सबसे बड़ा संकट मिलावट का है। दूध में पानी, घी में डालडा, पनीर में केमिकल और मसालों में रंग, यह मिलावट धीरे-धीरे हमारे शरीर को खोखला कर रही है। सहकारिता के इस अभियान के माध्यम से जब सहकारी समितियों से शुद्ध देसी उत्पाद लोगों तक पहुंचेंगे तो आम आदमी इस जहर से बच सकेगा। शुद्ध घी और शुद्ध पनीर जैसे उत्पादों की उपलब्धता से परिवार के स्वास्थ्य में सुधार होगा। यह अभियान मिलावटी खाद्य सामग्री के खिलाफ एक बड़ा प्रयास बन सकता है।
इस अभियान की एक महत्वपूर्ण कड़ी गोबर गैस प्लांट भी है। गोबर को अभी तक हम कचरा समझकर फेंक देते थे, लेकिन वही गोबर ऊर्जा का स्रोत बन सकता है। हर गांव में जब गोबर गैस प्लांट लगेंगे तो गांव को सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा मिलेगी। चूल्हे से धुआं कम होगा, महिलाओं के स्वास्थ्य को राहत मिलेगी और बची हुई गैस से बिजली भी बनाई जा सकेगी। गोबर गैस के बाद बचने वाली खाद खेतों की उर्वरा शक्ति लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आज हमारे खेत रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से प्रभावित हैं। गेहूं, मूंग, धान, चना और तुअर जैसी फसलें रसायनों के बोझ तले दब रही हैं। इसका असर हमारी थाली और स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। जब गोबर से बनी देसी खाद खेतों में जाएगी तो जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा। किसान को बेहतर मूल्य मिल सकता है और उपभोक्ता को अधिक शुद्ध भोजन। यही चक्र असली समृद्धि का चक्र बन सकता है।
इस पूरे अभियान का अंतिम लक्ष्य समृद्ध किसान का सपना पूरा करना है। जब किसान के पास गाय होगी तो दूध होगा, दूध होगा तो नियमित आय होगी और नियमित आय होगी तो किसान को कर्ज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा सकेगा, अपने खेत को बेहतर बना सकेगा और अपने परिवार को सुरक्षित रख सकेगा। पशुपालन, डेयरी उद्योग और जैविक खेती मिलकर गांवों को आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
यह अभियान केवल सरकार का नहीं, प्रदेश की साढ़े आठ करोड़ जनता का महायज्ञ है। जब तक हर व्यक्ति इसमें अपनी आहुति नहीं देगा, तब तक यह यज्ञ पूरा नहीं होगा। हर गांव में सहकारी समिति हो, हर समिति में शुद्धता और ईमानदारी का संकल्प हो और हर किसान को अपनी मेहनत का उचित मूल्य मिले, यही इस अभियान की सफलता का आधार होना चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह ने सहकार से समृद्धि का जो मंत्र दिया है, उसे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जमीन पर उतारने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। अब बारी जनता की है कि वह भी इस मंत्र को अपने जीवन में उतारे।
आने वाले समय में जब मध्य प्रदेश के गांवों में दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा, खेतों में जैविक फसलें लहलहाएंगी और घरों तक शुद्ध भोजन पहुंचेगा, तब सहकार से समृद्धि का सपना साकार होता दिखाई देगा। यह केवल दुग्ध क्रांति नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव की संभावना है। जरूरत केवल इस संकल्प को ईमानदारी, निरंतरता और जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ाने की है।














