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संपादकीय
07 Oct, 2026

न्यूरोसाइंस में असंभव खोज, अब मिट सकेंगी कड़वी यादें

वैज्ञानिक शोध में संकेत मिले हैं कि भविष्य में दर्दनाक यादों को मिटाने के बजाय उनके डर और भावनात्मक असर को कम किया जा सकता है।

टोरंटो, 07 अक्टूबर।

क्या आपके पास भी कोई ऐसी याद है, जिसे याद करते ही आज भी शर्मिंदगी से चेहरा लाल हो जाता है? कोई ऐसा पल, जिसे आप चाहें तो हमेशा के लिए अपने दिमाग से मिटा देना चाहते हैं? या फिर कोई बेहद खूबसूरत याद, जिसे उम्र भर संभालकर रखना चाहें? शायद दिमाग की भाषा और थेरेपी के जरिए बुरी याद के दर्दनाक असर को घटाया जा सकता है, जबकि उसका तथ्य दिमाग में बना रहता है।

यादों को सहेजने के लिए ऐसे प्रयोग हो रहे हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के वैज्ञानिकों ने अमिगडाला की उन कोशिकाओं को खत्म कर दिया, जो खौफनाक यादों को संभालती थीं। वैज्ञानिक ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक से चूहों के हिप्पोकैम्पस यानी मस्तिष्क के अंदरूनी हिस्से में यादों वाली खास कोशिकाओं को लेजर लाइट से सक्रिय करने में सफल रहे हैं। इंसानों में बिना दिमाग खोले ऐसा मुमकिन हो सकता है, क्योंकि विज्ञान अब यादों को सिर्फ समझने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि उन्हें बदलने, दबाने और दोबारा सक्रिय करने की दिशा में भी आगे बढ़ चुका है।

अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर ब्रेन एंड मेमोरी के एसोसिएट प्रोफेसर स्टीव रामिरेज की किताब ‘हाउ टू चेंज ए मेमोरी’ रॉयल सोसायटी त्रिवेदी साइंस बुक प्राइज के लिए भी शॉर्टलिस्ट हो चुकी है। चूहों पर किए गए प्रयोगों से यह साबित हो चुका है कि दिमाग में न्यूरॉन्स के स्तर पर बदलाव करके किसी याद को मिटाना, दोबारा जिंदा करना या नया रूप देना संभव है। रामिरेज बताते हैं कि मेमोरी दरअसल हमारे अनुभवों से दिमाग में होने वाला एक स्थायी बदलाव है। वैज्ञानिक इसे इंग्राम कहते हैं, यानी किसी खास याद से जुड़े मस्तिष्कीय बदलावों का पूरा नेटवर्क। जब भी हम किसी अनुभव से गुजरते हैं तो वह हमारे दिमाग की कोशिकाओं में एक स्थायी भौतिक छाप छोड़ जाता है। चूहों पर किए गए प्रयोग में वैज्ञानिकों ने उन कोशिकाओं की पहचान की, जो किसी खास अनुभव की याद से जुड़ी थीं। ऑप्टोजेनेटिक्स के जरिए प्रकाश के माध्यम से इन कोशिकाओं को सक्रिय करने पर पाया गया कि भले ही याद का मूल ट्रिगर मौजूद न हो, फिर भी वह याद दोबारा जीवित हो उठी।

बुरी यादों को मिटाने का रास्ता खुल सकता है। वैज्ञानिकों ने एक और चौंकाने वाली बात यह जानी कि अगर किसी डरावनी याद से जुड़ी कोशिकाओं को सकारात्मक अनुभव से जोड़ दिया जाए तो उस याद का डर कम हो जाता है। मसलन, चूहों में एक डरावनी जगह की याद को खुशी की याद से जोड़ने पर उस जगह से जुड़ा डर खत्म हो गया। इससे यह उम्मीद जगी है कि इंसानों में भी ट्रॉमा, गंभीर चिंता और मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए रास्ते खुल सकते हैं। मकसद याद को मिटाना नहीं, बल्कि शायद याद से जुड़ी तकलीफ को कम करना हो सकता है।

यहां एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या कड़वी यादों को पूरी तरह मिटा देना चाहिए? हमारे जीवन के दुखद अनुभव ही हमें मजबूत बनाते हैं। असफलता का दर्द ही हमें अगली बार बेहतर करने की प्रेरणा देता है। अगर हम अपनी सारी बुरी यादें मिटा देंगे तो क्या हम वही इंसान रहेंगे, जो आज हैं? वैज्ञानिकों का कहना है कि लक्ष्य याद को मिटाना नहीं, बल्कि उसके भावनात्मक बोझ को कम करना होना चाहिए। जैसे किसी दुर्घटना की याद तो रहे, लेकिन उसका डर और दर्द कम हो जाए, ताकि व्यक्ति सामान्य जीवन जी सके।

आज यह तकनीक केवल प्रयोगशाला में चूहों पर सफल हुई है। इंसानों पर इसे लागू करना अभी दूर की बात है, लेकिन शोध भविष्य में नई संभावनाओं की ओर इशारा कर रहा है। हो सकता है आने वाले वर्षों में ऐसी थेरेपी विकसित हो, जहां बिना दिमाग खोले ही बुरी यादों के असर को कम किया जा सके। यह थेरेपी उन लोगों के लिए वरदान होगी, जो सालों से किसी दर्दनाक हादसे के ट्रॉमा से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही नैतिक सवाल भी उठेंगे कि क्या किसी की यादों के साथ छेड़छाड़ करना सही है? क्या इससे हमारी पहचान बदल जाएगी?

दिमाग आज भी विज्ञान के लिए सबसे बड़ा रहस्य है। हम उसके केवल दस प्रतिशत हिस्से को ही समझ पाए हैं। न्यूरोसाइंस में यह खोज उस खिड़की को खोलती है, जो यादों के रहस्य को समझने में मदद करेगी। हो सकता है भविष्य में हम अपनी यादों को कंप्यूटर की फाइलों की तरह सहेज सकें, अच्छी यादों को बार-बार देख सकें और बुरी यादों को डिलीट कर सकें। यह सुनने में किसी फिल्म जैसा लगता है, लेकिन विज्ञान इसे हकीकत बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। यादें ही हमें इंसान बनाती हैं। अच्छी यादें हमें खुशी देती हैं और बुरी यादें हमें सबक देती हैं। अगर विज्ञान कड़वी यादों के दर्द को कम करने में मदद करता है तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी, लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि यादों को मिटाने की ताकत के साथ उन्हें सहेजने की जिम्मेदारी भी आती है। भविष्य में जब यह तकनीक इंसानों पर लागू होगी तो समाज को तय करना होगा कि इसका उपयोग कहां तक सही है और कहां तक गलत। फिलहाल तो यह खोज यही बताती है कि दिमाग में कुछ भी स्थायी नहीं है, हर याद को बदला जा सकता है और हर जख्म को भरा जा सकता है।

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