भोपाल, 07 अक्टूबर।
भोपाल की पहचान उसकी झीलें और हरियाली है, लेकिन मास्टर प्लान 2047 में प्रस्तावित 791 किलोमीटर लंबे सड़क नेटवर्क ने इस पहचान पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। अनुमान के मुताबिक, इस पूरे नेटवर्क के लिए करीब 2 लाख 89 हजार पेड़ों की बलि चढ़ सकती है। हाल ही में एनएचएआई की 16.44 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए ही लगभग 6 हजार पेड़ काटे गए थे, यानी औसतन 365 पेड़ प्रति किलोमीटर। इसी औसत से 791.42 किलोमीटर के नेटवर्क के लिए 2,88,868 पेड़ों का नुकसान तय है।
प्रशासन का तर्क है कि बढ़ती आबादी और ट्रैफिक के दबाव को कम करने के लिए सड़कें जरूरी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हरियाली की कीमत पर किया गया विकास सच में विकास कहलाएगा या यह शहर के फेफड़ों पर सीधा हमला है।
इस योजना का सबसे कमजोर पक्ष बिना ग्राउंड सर्वे के नक्शे पर लाइन खींच देना है, जिसे एक्सपर्ट ओवरलैपिंग मार्किंग कह रहे हैं। कई जगहों पर पहले से मौजूद अच्छी-भली सड़कों को ही नई प्रस्तावित सड़क के रूप में दिखा दिया गया है। मैनिट भोपाल के प्लानिंग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कागज पर सड़क बनाना आसान है, लेकिन जमीन पर उसकी कीमत पेड़ों को चुकानी पड़ती है।
पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी. पांडे और राशिद नूर जैसे विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इतनी बड़ी कटाई से शहर का तापमान बढ़ेगा, भूजल स्तर गिरेगा और वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच जाएगा। भोपाल मास्टर प्लान 2005 में भी ग्रीन बेल्ट को बचाने का वादा था, लेकिन हकीकत में उन पर कॉलोनियां बन गईं। अब 2047 में वही गलती दोहराई गई तो राजधानी सांस लेने लायक भी नहीं बचेगी।
एक पेड़ की कीमत 1450 रुपये तय करना इस पूरे सिस्टम की बड़ी खामी दिखाता है। 50 साल पुराने बरगद या पीपल की कीमत सिर्फ मुआवजे से नहीं आंकी जा सकती। समाधान यही है कि सड़क भी बने और पेड़ भी बचें। इसके लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, एलिवेटेड रोड, ग्रीन कॉरिडोर, एक के बदले दस पेड़ लगाने और ट्रांसप्लांटेशन की नीति को सख्ती से लागू करना होगा। वरना यह विकास भोपाल को झीलों के शहर से धूल का शहर बना देगा।













