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संपादकीय
06 Oct, 2026

दरबार चलता है तो बाजार चलता है

जम्मू-कश्मीर की दरबार मूव परंपरा प्रशासन के साथ जम्मू और श्रीनगर की आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और बाजार को भी प्रभावित करती है।

जम्मू, 06 अक्टूबर।

जम्मू-कश्मीर में एक परंपरा सदियों से चली आ रही है। छह महीने श्रीनगर राजधानी और छह महीने जम्मू राजधानी। यह केवल राजधानी बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि आर्थिक संतुलन का सबसे बड़ा प्रयोग है। अक्टूबर से मार्च तक जब बर्फ श्रीनगर को ढक लेती है, तब पूरी सरकार फाइलों, ट्रकों और कर्मचारियों के साथ जम्मू आ जाती है और फिर गर्मियों में वापस श्रीनगर चली जाती है। हमने जब स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, व्यापारियों और नौकरशाहों से बात की तो अधिकांश का यही कहना था कि दरबार मूव केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक परिवर्तन का मार्ग भी प्रशस्त करता है।

इस परंपरा की शुरुआत डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह और रणबीर सिंह के समय से मानी जाती है। कारण था मौसम। श्रीनगर में सर्दियों में तापमान शून्य से नीचे चला जाता है, झेलम जम जाती है और कामकाज ठप हो जाता है। जम्मू का मौसम अपेक्षाकृत गर्म रहता है, इसलिए दरबार को जम्मू स्थानांतरित किया जाता था। यह परंपरा आज भी जीवित है और अब इसका स्वरूप आर्थिक हो गया है। सरकार के साथ हजारों लोगों का आना-जाना लगा रहता है और इससे दोनों क्षेत्रों में पैसों का प्रवाह बना रहता है। जब सरकार चलती है तो व्यापार चलता है।

स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि दरबार के साथ ही लक्ष्मी चलती है। जब सरकार श्रीनगर में होती है तो वहां होटल, हाउसबोट, टैक्सी और दुकानें सब चलती हैं और जब सरकार जम्मू आती है तो जम्मू के बाजारों में रौनक आ जाती है। छह महीने तक सचिवालय के आसपास खाने-पीने की दुकानों, स्टेशनरी की दुकानों और किराए के मकानों की मांग बढ़ जाती है। जम्मू के व्यापारी बताते हैं कि दरबार के समय उनकी साल भर की कमाई का साठ प्रतिशत हिस्सा इन्हीं छह महीनों में हो जाता है। उसी तरह श्रीनगर के व्यापारी गर्मियों में सरकार के आने का इंतजार करते हैं। यह एक तरह का आर्थिक संतुलन है।

दरबार मूव केवल अफसरों का मूव नहीं है, यह रोजगार का मूव भी है। हर साल हजारों ट्रक फाइलों और सामान को लेकर जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू जाते हैं। इससे परिवहन क्षेत्र को बड़ा रोजगार मिलता है। इसके अलावा अस्थायी कर्मचारियों, दैनिक वेतनभोगियों, लोडरों और सुरक्षा कर्मियों को भी काम मिलता है। जम्मू में जब सचिवालय आता है तो किराए के मकानों की मांग बढ़ जाती है और कई परिवार केवल किराए की आय से अपना साल भर का खर्च निकाल लेते हैं। श्रीनगर में भी यही स्थिति है। पर्यटन और सरकारी कर्मचारियों के कारण वहां भी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

कुछ लोग दरबार मूव को फिजूलखर्ची भी कहते हैं। सरकार को हर साल स्थानांतरण पर करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। फाइलों के गुम होने का डर रहता है, कामकाज कुछ दिनों के लिए ठप होता है और इंटरनेट, फाइल सिस्टम के इस युग में इस परंपरा की प्रासंगिकता पर सवाल उठते हैं। स्थानीय जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इस खर्च को केवल खर्च के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह एक निवेश है, जो दो क्षेत्रों को जोड़ता है। अगर सरकार केवल एक ही जगह रहेगी तो दूसरा क्षेत्र उपेक्षित महसूस करेगा और आर्थिक असमानता बढ़ेगी। दरबार मूव इस असमानता को कम करता है।

जम्मू और कश्मीर दो अलग-अलग संस्कृतियां हैं, दो अलग-अलग जलवायु हैं और दो अलग-अलग बाजार हैं। दरबार मूव इन दोनों को एक धागे में पिरोता है। जम्मू के लोग जब श्रीनगर जाते हैं तो वहां की संस्कृति को समझते हैं और श्रीनगर के लोग जब जम्मू आते हैं तो यहां के व्यापार को समझते हैं। यह आदान-प्रदान केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक भी है। नौकरशाहों का कहना है कि इससे पूरे प्रदेश का संतुलित विकास होता है। एक क्षेत्र में छह महीने सरकार रहने से वहां की समस्याओं को नजदीक से देखा जा सकता है और उनका तुरंत समाधान किया जा सकता है।

अब समय बदल गया है। ई-फाइल और ई-ऑफिस का युग आ गया है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद प्रशासनिक ढांचे में भी बदलाव आया है। सरकार ने एक बार दरबार मूव को रोकने का निर्णय भी लिया था, लेकिन स्थानीय भावना और आर्थिक कारणों से इसे फिर से जारी रखना पड़ा। व्यापारी वर्ग का मानना है कि अगर यह परंपरा पूरी तरह बंद हो गई तो दोनों शहरों की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। जम्मू के कई बाजार तो केवल दरबार के भरोसे ही चलते हैं और श्रीनगर में भी सरकारी कर्मचारियों के कारण बाजार में जान आती है। इसलिए आधुनिक तकनीक के साथ इस परंपरा को जारी रखना जरूरी है।

आवश्यकता इस बात की है कि दरबार मूव को और अधिक व्यवस्थित किया जाए। खर्च को कम करने के लिए डिजिटल शिफ्टिंग को बढ़ावा दिया जाए, लेकिन भौतिक उपस्थिति भी बनाए रखी जाए। सरकार को चाहिए कि शिफ्टिंग के समय को एक उत्सव के रूप में मनाए, ताकि व्यापार को और बढ़ावा मिले। स्थानीय नागरिकों का सुझाव है कि दोनों राजधानियों में स्थायी सचिवालय रहें, लेकिन मंत्री और प्रमुख अधिकारी छह-छह महीने दोनों जगह रहें। इससे खर्च भी कम होगा और आर्थिक संतुलन भी बना रहेगा।

दरबार मूव केवल फाइलों का आना-जाना नहीं है। यह जम्मू-कश्मीर की आत्मा है। यह आर्थिक परिवर्तन का वह मार्ग है, जो सदियों से दोनों क्षेत्रों को जोड़ता आ रहा है। जब दरबार चलता है तो बाजार चलता है, जब बाजार चलता है तो रोजगार चलता है और जब रोजगार चलता है तो विकास चलता है। इसलिए यह परंपरा केवल परंपरा नहीं है, बल्कि आर्थिक संतुलन बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसे बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।

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आज का राशिफल

समाज में मान-सम्मान बढ़ेगा। आय-व्यय की स्थिति समान रहेगी। व्यापार व व्यवसाय में ध्यान देने से सफलता मिलेगी। मेल-मिलाप से काम बनाने की कोशिश सफल होगी। कामकाज में आ रहा अवरोध दूर होकर प्रगति का रास्ता मिल जाएगा। अपने काम में सुविधा मिल जाने से प्रगति होगी। शुभांक-3-5-7

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