भोपाल, 25 अप्रैल
भारत की सनातन परंपरा, जो सदियों से जीवन दर्शन के रूप में स्थापित है, अब किन्नर समाज में एक बदलाव का कारण बन रही है। किन्नर समाज अब अपने धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनः परिभाषित करने की ओर अग्रसर है, जिसमें "घर वापसी" के जरिए वे अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। यह बदलाव विशेषकर उस समय दिखाई दे रहा है जब किन्नर समुदाय अपने जीवनशैली और अभिवादन में भी परिवर्तन ला रहा है। "अस्सलाम वालेकुम" की जगह अब "जय श्रीराम" और "राम-राम" जैसे अभिवादन उनके नए पहचान का हिस्सा बन रहे हैं।
मध्य प्रदेश के इटारसी में आयोजित अखिल भारतीय किन्नर सनातन सम्मेलन ने इस बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। इस सम्मेलन में सात किन्नरों ने इस्लाम धर्म को छोड़कर सनातन धर्म को अपनाया और "घर वापसी" की घोषणा की। इस अवसर पर किन्नर जगतगुरु काजल ठाकुर के सानिध्य में वैदिक मंत्रोच्चार, हवन और अभिषेक के माध्यम से शुद्धिकरण प्रक्रिया संपन्न की गई। इसमें लगभग 500 किन्नरों ने भाग लिया और इस धार्मिक बदलाव के संकेत दिए।
इटारसी में आयोजित इस कार्यक्रम में सात किन्नरों को "महामंडलेश्वर" की उपाधि से सम्मानित किया गया। इन किन्नरों में से एक, पांचाली गुरु, ने बताया कि वे पहले एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे, लेकिन दबाव के कारण उन्होंने इस्लाम अपनाया था। वे अब अपने सनातन धर्म में लौटकर आत्मिक शांति का अनुभव कर रहे हैं। गुरु काजल ठाकुर ने कहा कि सनातन धर्म सभी को अपनाता है और यही इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
मध्य प्रदेश में पिछले एक साल में "घर वापसी" का यह अभियान संगठित रूप लेता जा रहा है। महाशिवरात्रि के आसपास भोपाल में एक विशाल सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें किन्नरों ने सनातन धर्म में वापसी की घोषणा की। इस कार्यक्रम में किन्नर नेता हिमांगी सखी को "पहली किन्नर शंकराचार्य" घोषित किया गया।
खंडवा और मुलताई में भी इस आंदोलन के प्रमुख केंद्र बने, जहां किन्नरों ने इस्लाम छोड़कर सनातन धर्म अपनाया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से किन्नर समाज में एक प्रतीकात्मक परिवर्तन का संकेत मिल रहा है, जो उनके सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव को पुनः स्थापित करने की कोशिश है।









