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30 Apr, 2026

यूपीआई बना दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म, भारत की अर्थव्यवस्था को नई ताकत

दस वर्षों में यूपीआई ने भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए दुनिया के सबसे बड़े रीयल टाइम भुगतान प्लेटफॉर्म के रूप में वैश्विक पहचान हासिल की है।

नई दिल्ली, 30 अप्रैल

डिजिटल भुगतान व्यवस्था के क्षेत्र में एक दशक में ही यूपीआई ने वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी रीयल टाइम भुगतान प्रणाली के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर ली है और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की मजबूत आधारशिला बन गया है।

लगभग दस वर्ष पहले शुरू हुई यह व्यवस्था आज उस स्थिति में पहुंच चुकी है, जहां यह दुनिया के कुल त्वरित भुगतान लेनदेन का लगभग आधा हिस्सा संभाल रही है और भारत में भुगतान, बचत तथा लेनदेन की पूरी परिभाषा बदल चुकी है।

इस प्रणाली की शुरुआत 11 अप्रैल 2016 को भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक के नियामकीय नियंत्रण में की गई थी और आज यह भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में कार्य कर रही है, जिसने वित्तीय समावेशन को गति देने के साथ डिजिटल व्यापार को भी नई दिशा दी है।

यूपीआई की विकास यात्रा बेहद तेज रही है, जहां शुरुआत में पहले महीने में केवल 373 लेनदेन दर्ज हुए थे, वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह संख्या बढ़कर लगभग 24,162 करोड़ तक पहुंच गई, जो कई हजार गुना वृद्धि को दर्शाती है।

इसी अवधि में लेनदेन के मूल्य में भी अभूतपूर्व उछाल देखा गया, जहां शुरुआती वर्षों के 0.07 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर यह आंकड़ा वित्तीय वर्ष 2025-26 में लगभग 314 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

वर्तमान में यह प्रणाली प्रतिदिन करीब 66 करोड़ लेनदेन संभाल रही है, जिनका दैनिक मूल्य लगभग 0.86 लाख करोड़ रुपये के आसपास है, जबकि अगस्त 2025 में मासिक लेनदेन 2000 करोड़ के पार पहुंच गए और मार्च 2026 में यह रिकॉर्ड 2264 करोड़ तक पहुंच गया।

देश में डिजिटल भुगतान के कुल लेनदेन में यूपीआई की हिस्सेदारी लगभग 85 प्रतिशत हो चुकी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह प्रणाली छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े संस्थानों और सरकारी सेवाओं तक गहराई से जुड़ चुकी है।

बैंकों की भागीदारी भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, जहां शुरुआत में केवल 21 बैंक जुड़े थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 703 तक पहुंच गई है, जिससे देश के दूरदराज क्षेत्रों तक भी इसकी पहुंच सुनिश्चित हुई है।

लेनदेन के स्वरूप में भी स्पष्ट अंतर देखने को मिलता है, जहां व्यक्ति से व्यापारी भुगतान लगभग 63 प्रतिशत लेनदेन का हिस्सा है, वहीं व्यक्ति से व्यक्ति लेनदेन मूल्य के हिसाब से लगभग 71 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है।

छोटे मूल्य के लेनदेन इस व्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं, जहां 500 रुपये से कम के लेनदेन कुल व्यापारी लेनदेन का लगभग 86 प्रतिशत हैं, जिससे दैनिक जीवन के छोटे-छोटे भुगतान भी डिजिटल हो गए हैं।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इसे दुनिया की सबसे बड़ी रीयल टाइम भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी है और वैश्विक रीयल टाइम भुगतान में भारत की हिस्सेदारी लगभग 49 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

यह प्रणाली अब केवल देश तक सीमित नहीं रही, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, फ्रांस, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस और कतर जैसे देशों में भी सक्रिय हो चुकी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को नई सुविधा मिली है।

इसने वित्तीय प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नवाचार को भी बढ़ावा दिया है, जहां डिजिटल वॉलेट और भुगतान समाधान तेजी से विकसित हुए हैं और एक मजबूत डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र तैयार हुआ है।

कम लागत और बिना भौतिक ढांचे के त्वरित लेनदेन ने ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे व्यवसायों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ा है, जिससे वित्तीय समावेशन को व्यापक गति मिली है।

भविष्य में इस प्रणाली के विस्तार की दिशा में और अधिक उपयोगकर्ताओं व व्यापारियों को जोड़ने, वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने तथा ऋण, बीमा और अंतरराष्ट्रीय भुगतान जैसे क्षेत्रों में नवाचार पर जोर दिया जा रहा है।

एक दशक में चंद लेनदेन से शुरू होकर आज अरबों रुपये के दैनिक प्रवाह तक पहुंची यह व्यवस्था भारत के डिजिटल परिवर्तन और आर्थिक ढांचे में आए बड़े बदलाव का प्रतीक बन चुकी है।

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