नई दिल्ली, 22 अप्रैल
देश के रियल एस्टेट क्षेत्र में वर्ष 2025 के दौरान जमीन खरीद-बिक्री में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में भूमि अधिग्रहण में सालाना आधार पर 32 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिसके तहत डेवलपर्स ने 149 सौदों के माध्यम से 3,093 एकड़ जमीन खरीदी, जिसकी कुल कीमत 54,818 करोड़ रुपये रही।
रिपोर्ट में बताया गया है कि इस अधिग्रहित भूमि पर अगले दो से पांच वर्षों में लगभग 229 मिलियन वर्ग फुट निर्माण की संभावना है, जो इस क्षेत्र में मजबूत मांग और डेवलपर्स के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है।
निवेश के मामले में बड़े शहरों का दबदबा साफ नजर आया है। कुल निवेश का 89 प्रतिशत हिस्सा टियर-1 शहरों में केंद्रित रहा, जबकि भूमि हिस्सेदारी केवल 52 प्रतिशत रही। इससे यह संकेत मिलता है कि बड़े शहरों में जमीन की कीमत अधिक है और निवेश का झुकाव भी वहीं अधिक है।
इसके विपरीत, टियर-2 शहरों में कुल जमीन सौदों का 48 प्रतिशत हिस्सा रहा, लेकिन उन्हें केवल 11 प्रतिशत निवेश ही प्राप्त हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि इन शहरों में जमीन अपेक्षाकृत सस्ती है और भविष्य में विकास की अधिक संभावनाएं मौजूद हैं।
वर्ष 2026 की शुरुआत में भी यह रफ्तार जारी रही है। पहली तिमाही में ही प्रमुख बाजारों में करीब 900 एकड़ जमीन की खरीद हुई, जिसकी कीमत लगभग 18,000 करोड़ रुपये आंकी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ा सौदा मुंबई महानगर क्षेत्र में हुआ, जहां 11 एकड़ जमीन करीब 5,400 करोड़ रुपये में खरीदी गई।
इन परियोजनाओं के विकास के लिए 92,000 करोड़ रुपये से अधिक निवेश की आवश्यकता होगी। इसमें से लगभग 52,000 करोड़ रुपये बाहरी स्रोतों से जुटाए जाने की संभावना है, जिसमें वैकल्पिक निवेश कोष, निजी ऋण कंपनियां और बड़े निवेशक शामिल हो सकते हैं।
आगामी परियोजनाओं में कुल निवेश का लगभग 89 प्रतिशत हिस्सा टियर-1 शहरों में ही रहेगा, जहां प्रीमियम रियल एस्टेट की मांग अधिक और परियोजनाओं की लागत भी ऊंची है।
आवासीय परियोजनाएं इस क्षेत्र की प्रमुख ताकत बनी हुई हैं। कुल भूमि उपयोग में इनकी हिस्सेदारी 78 प्रतिशत और कुल फंडिंग में करीब 76 प्रतिशत है, जिनकी निर्माण लागत 72,000 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है।
कार्यालय परियोजनाओं के लिए लगभग 8,700 करोड़ रुपये के निवेश की जरूरत बताई गई है, जो उच्च गुणवत्ता वाले कार्यालय स्थान की लगातार बनी हुई मांग को दर्शाता है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अधिकांश भूमि सौदे व्यक्तिगत विक्रेताओं द्वारा किए गए, जिनकी हिस्सेदारी 65 प्रतिशत रही।
शहरों के अनुसार रुझान भी अलग-अलग देखने को मिले। चेन्नई, मुंबई, बेंगलुरु और पुणे जैसे शहरों में व्यक्तिगत विक्रेता अधिक सक्रिय रहे, जबकि हैदराबाद में कॉर्पोरेट कंपनियों की भूमिका प्रमुख रही। वहीं, दिल्ली-एनसीआर में अधिकतर सौदे सरकारी संस्थाओं के माध्यम से हुए।
रियल एस्टेट क्षेत्र में अब नए क्षेत्रों की ओर भी रुझान बढ़ रहा है। डेवलपर्स पारंपरिक परियोजनाओं के अलावा डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स पार्क और अन्य वैकल्पिक क्षेत्रों में निवेश की संभावनाएं तलाश रहे हैं।



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