नई दिल्ली, 13 अप्रैल 2026।
सियाचिन दिवस के पावन अवसर पर जब ऑपरेशन मेघदूत अपने 42 गौरवशाली वर्ष पूर्ण कर रहा है, भारतीय वायु सेना और थलसेना की उत्तरी कमान ने एकसाथ उन तमाम वीर योद्धाओं को नमन किया जो लद्दाख के सियाचिन हिमनद पर दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र में तैनात हैं या जिन्होंने वहां अपने प्राणों की आहुति दी। 13 अप्रैल 1984 को इसी दिन भारतीय थलसेना और वायु सेना ने मिलकर उत्तरी लद्दाख की रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा जमाने के लिए सियाचिन हिमनद की ओर ऐतिहासिक कदम बढ़ाए थे, तभी से यह तिथि सियाचिन दिवस के रूप में अंकित हो गई।
वायु सेना ने सामाजिक मंच पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि इन वीरों का अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता और सर्वोच्च बलिदान सदा स्मरणीय रहेगा। कठोरतम मौसम और दुर्गम पहाड़ी भूभाग में शौर्य, धैर्य और अभियान की उत्कृष्टता की यह विरासत अतुलनीय है। रणनीतिक हवाई आपूर्ति और रसद प्रबंधन से लेकर अत्यधिक ऊंचाई पर घायल जवानों की सुरक्षित निकासी तक वायु सेना की भूमिका सियाचिन में सदा अपरिहार्य रही है और आज भी वह इस क्षेत्र में पूरी सतर्कता के साथ अभियान संचालन की तैयारी बनाए हुए है।
उत्तरी कमान के सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा और उत्तरी कमान के समस्त जवानों ने भी इस अवसर पर बर्फीली चोटियों पर डटे हर वीर सैनिक के साहस और समर्पण को सलाम किया तथा उन शहीद वीरों की स्मृति को श्रद्धासुमन अर्पित किए जिन्होंने विश्व के सर्वोच्च रणक्षेत्र पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यह दिन केवल एक सैन्य अभियान की वर्षगांठ नहीं बल्कि उन असंख्य बलिदानों की याद दिलाता है जो इस हिमाच्छादित भूमि की रक्षा में दिए गए।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार ऑपरेशन मेघदूत की नींव दरअसल 1978 में ही पड़ गई थी जब चेतक हेलीकॉप्टर सियाचिन हिमनद पर उतरने वाले पहले वायु सेना हेलीकॉप्टर बने। इसके बाद से वायु सेना के हेलीकॉप्टर लगातार इस क्षेत्र में उड़ान भरते रहे और 1984 में जब पूर्ण अभियान की आवश्यकता पड़ी तो यह अनुभव अत्यंत काम आया। उस समय पाकिस्तान लद्दाख के अज्ञात क्षेत्रों में मानचित्रीय चालबाजी के जरिए विदेशी पर्वतारोहण दलों को सियाचिन में प्रवेश की अनुमति देकर इस भूभाग पर अपना दावा मजबूत करने की फिराक में था और उसकी सैन्य कार्रवाई की भी खुफिया सूचनाएं मिल रही थीं, तब भारत ने समय रहते निर्णायक कदम उठाने का संकल्प लिया।
इस ऐतिहासिक अभियान में वायु सेना के एएन-12, एएन-32 और आईएल-76 जैसे सामरिक और रणनीतिक परिवहन विमानों ने सैनिकों और सैन्य सामग्री को ऊंचाई वाले हवाई अड्डों तक पहुंचाया, जहां से एमआई-17, एमआई-8, चेतक और चीता हेलीकॉप्टरों ने हेलीकॉप्टर निर्माताओं की तय सीमाओं को भी पार करते हुए हिमनद की चक्कर काटने वाली अत्यधिक ऊंचाइयों तक जवानों और जरूरी सामान को सफलतापूर्वक पहुंचाया, जो अपने आप में एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी।



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