नई दिल्ली, 12 अप्रैल 2026।
उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने रविवार को भारत मंडपम में आयोजित “विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप से जनजातीय जीवन का रूपांतरण—भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण” विषयक सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण को साथ लेकर चलना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जब आधुनिक विज्ञान भाषा, आस्था और संस्कृति से जुड़ता है, तो यह संरक्षण और सशक्तिकरण दोनों का प्रभावी माध्यम बन जाता है।
उपराष्ट्रपति ने जनजातीय समाज के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि देश में लगभग 1.4 लाख जनजातीय गांव हैं, जो कुल आबादी का करीब नौ प्रतिशत हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि ये समुदाय देश की जैव विविधता के संरक्षक हैं और सदियों से सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जनजातीय समाज में डिजाइन, वस्त्र और रंग संयोजन की अद्भुत क्षमता है, जो सतत और रचनात्मक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संसाधन है।
राधाकृष्णन ने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों में हरित आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं और “विकसित भारत @ 2047” की परिकल्पना “विकास भी, विरासत भी” के सिद्धांत पर आधारित है।
उन्होंने अपने सांसद कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उन्होंने छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड जैसे राज्यों के गठन का समर्थन किया था, जिससे जनजातीय कल्याण को गति मिली। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी याद किया, जिन्होंने जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना कर न्याय और गरिमा की दिशा में कदम बढ़ाया था।
उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के प्रयासों की भी सराहना की।
उपराष्ट्रपति ने सरकार की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि पीएम-जनमन कार्यक्रम के तहत 2,400 से अधिक सड़कों और लगभग 7,300 किलोमीटर मार्ग तथा 160 से अधिक पुलों को स्वीकृति दी गई है।
उन्होंने धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान का भी उल्लेख किया, जिसके माध्यम से 63,000 से अधिक जनजातीय गांवों में जल, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसी सुविधाओं में सुधार किया जा रहा है।
उन्होंने उत्तर-पूर्व में तेजी से हो रहे विकास और कनेक्टिविटी विस्तार का उल्लेख करते हुए समावेशी विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।
उन्होंने ITITI दून संस्कृत विद्यालय के रजत जयंती वर्ष पर बधाई देते हुए कहा कि यह संस्था जनजातीय बच्चों को निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का प्रमुख केंद्र बन चुकी है, जिससे उत्तराखंड, उत्तर-पूर्व और लद्दाख के 2,000 से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं।











