वैश्विक संगठन
13 Apr, 2026

मध्य पूर्व युद्ध की आर्थिक मार: आईएमएफ-विश्व बैंक बैठक पर संकट की छाया

मध्य पूर्व युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को तीसरा बड़ा झटका देते हुए विकासशील देशों की विकास दर और खाद्य सुरक्षा को गंभीर खतरे में डाल दिया है, जिसकी पृष्ठभूमि में आईएमएफ और विश्व बैंक की वाशिंगटन बैठक में अरबों डॉलर की आपातकालीन सहायता और ऋण पुनर्गठन पर मंथन होगा।

वाशिंगटन, 13 अप्रैल 2026।

मध्य पूर्व युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ रहा है और इस संकट की छाया में आईएमएफ तथा विश्व बैंक की बैठकें इस सप्ताह वाशिंगटन में आयोजित होने जा रही हैं। कोविड महामारी और यूक्रेन युद्ध के बाद यह तीसरा बड़ा झटका है जिसने वैश्विक अर्थतंत्र को हिलाकर रख दिया है। दुनियाभर के शीर्ष वित्त अधिकारी इस बैठक में एकत्रित होंगे।

आईएमएफ और विश्व बैंक के वरिष्ठ अधिकारियों ने पिछले सप्ताह स्पष्ट किया कि युद्ध के कारण वैश्विक विकास दर के अनुमान को घटाया जाएगा और मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान को ऊपर की ओर संशोधित किया जाएगा। उन्होंने चेताया कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति में व्यवधान से उभरती अर्थव्यवस्थाओं एवं विकासशील देशों पर सबसे अधिक मार पड़ेगी। 28 फरवरी को ईरान युद्ध शुरू होने से पहले दोनों संस्थाओं को वैश्विक विकास दर बढ़ने की उम्मीद थी।

विश्व बैंक के आधारभूत अनुमान के अनुसार उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों में 2026 में विकास दर 3.65 प्रतिशत रहने का अनुमान है जो अक्टूबर में 4 प्रतिशत था। यदि युद्ध लंबा खिंचा तो यह दर 2.6 प्रतिशत तक गिर सकती है। इन देशों में मुद्रास्फीति 2026 में 4.9 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है जो पहले 3 प्रतिशत थी और बदतर स्थिति में यह 6.7 प्रतिशत तक जा सकती है।

आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध जारी रहा और उर्वरक आपूर्ति बाधित होती रही तो करीब 4.5 करोड़ अतिरिक्त लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर सकते हैं। दोनों संस्थाएं इस नवीनतम संकट से निपटने और कमजोर देशों की मदद के लिए तेजी से कदम उठा रही हैं, जबकि सार्वजनिक कर्ज पहले से ही रिकॉर्ड स्तर पर है और बजट बेहद तंग हैं।

आईएमएफ को निकट भविष्य में निम्न आय और ऊर्जा आयातक देशों को 2000 से 5000 करोड़ डॉलर की आपातकालीन सहायता की मांग आने की संभावना है। विश्व बैंक ने कहा है कि वह निकट भविष्य में संकट प्रतिक्रिया उपकरणों के जरिए करीब 2500 करोड़ डॉलर जुटा सकता है और जरूरत पड़ने पर छह महीनों में 7000 करोड़ डॉलर तक की व्यवस्था कर सकता है। हालांकि अर्थशास्त्री सरकारों से केवल लक्षित और अस्थायी उपाय अपनाने का आग्रह कर रहे हैं ताकि मुद्रास्फीति और न बढ़े।

विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने कहा कि अतीत में भी हम संकटों से उबरे हैं और राजकोषीय तथा मौद्रिक नियंत्रण के प्रयासों ने अर्थव्यवस्थाओं को संभाला है, लेकिन यह झटका व्यवस्था को हिला देने वाला है। देशों के सामने अब मुद्रास्फीति पर काबू रखते हुए विकास को बनाए रखने की कठिन चुनौती है और साथ ही 2035 तक विकासशील देशों में कामकाजी उम्र में प्रवेश करने वाले 1.2 अरब लोगों के लिए रोजगार सृजन की दीर्घकालिक जिम्मेदारी भी है।

आईएमएफ और विश्व बैंक को अब एक बिल्कुल बदले हुए वैश्विक परिदृश्य में काम करना पड़ रहा है जहां अमेरिका और चीन के बीच तनाव चरम पर है और जी-20 की संकट समन्वय क्षमता कमजोर पड़ गई है। अमेरिका इस समय जी-20 की घूर्णी अध्यक्षता संभाल रहा है लेकिन उसने सदस्य देश दक्षिण अफ्रीका को भागीदारी से बाहर कर दिया है जिससे समूह की समन्वय क्षमता और जटिल हो गई है। अटलांटिक काउंसिल के अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख का कहना है कि जब दुनिया में किसी बात पर आम सहमति नहीं है तो सर्वसम्मति से काम करना बेहद मुश्किल है।

आईएमएफ, विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय ऋणदाताओं के बयान स्पष्ट रूप से बाजारों को आश्वस्त करने के लिए दिए जा रहे हैं। निजी लेनदारों को संदेश दिया जा रहा है कि वे संकटग्रस्त देशों से पूंजी न निकालें क्योंकि बहुपक्षीय विकास बैंकों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का समर्थन मिलेगा और यह कोविड जैसी स्थिति नहीं बनेगी।

वैश्विक विकास केंद्र से जुड़ी अमेरिकी ट्रेजरी की पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि कई उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाएं इस संकट में पहले से कमजोर स्थिति में हैं, उनके पास कम भंडार है, कर्ज की समस्या गहरी है और विदेशी मुद्रा भंडार भी घटा है। उन्होंने कहा कि इस संकट को आईएमएफ हितधारकों के लिए यह पुनर्विचार करने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए कि संस्था कमजोर देशों को कैसे सहयोग दे और विकास की बलि चढ़ाकर भंडार पुनर्निर्माण के लिए नहीं कहा जाना चाहिए।

अटलांटिक काउंसिल से जुड़े आईएमएफ के पूर्व रणनीति प्रमुख का मत है कि आईएमएफ को दाता देशों के साथ मिलकर उधारकर्ताओं के लिए ऋण पुनर्गठन में तेजी लानी चाहिए और उन्हें कर्ज के चक्र से बाहर निकालना चाहिए। नए ऋण को विश्वसनीय ऋण-कटौती रोडमैप से जोड़ा जाना चाहिए। रॉकफेलर फाउंडेशन के उपाध्यक्ष ने बताया कि निम्न आय और निम्न मध्यम आय वर्ग के देश 2025 में कोविड से पहले की तुलना में दोगुना कर्ज सेवा भुगतान कर रहे हैं जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी सामाजिक कार्यक्रमों के लिए धन सीमित हो गया है। इनमें से आधे देश अब कर्ज संकट में हैं या उसके करीब हैं जो कुछ साल पहले एक चौथाई थे। यह नया संघर्ष महामारी और यूक्रेन युद्ध के बाद जो भी सुधार हुआ था उसे पलट सकता है और देशों को दीर्घकालिक कर्ज-विकास-निवेश के जाल में फंसाए रख सकता है।

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