01 मई।
राज्य भर में शिक्षकों को हर वर्ष औपचारिक रूप से अवकाश दिया जाता है, परंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। कागजों में दर्ज छुट्टी और जमीन पर जारी ड्यूटी का यह विरोधाभास न केवल प्रशासनिक विसंगति को उजागर करता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इस वर्ष भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। एक ओर अवकाश घोषित है, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों को समर कैंप, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और जनगणना जैसी जिम्मेदारियों में उलझा दिया गया है। सुबह और शाम दोनों समय ड्यूटी निभाने के बाद भी उनकी छुट्टी “स्वीकृत” बनी रहती है, जो व्यवस्था की विडंबना को स्पष्ट करता है।
शिक्षकों से अपेक्षा की जाती है कि वे विद्यार्थियों को बेहतर परिणाम दें, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारें और नई पीढ़ी का निर्माण करें। लेकिन जब वही शिक्षक दिनभर अलग-अलग गैर-शैक्षणिक कार्यों में व्यस्त रहेंगे, तो वे अपने मूल दायित्व पर कितना ध्यान दे पाएंगे। सुबह 7 से 9 बजे तक समर कैंप में भागीदारी और शाम को पुनः उसी में उपस्थिति—यह दिनचर्या किसी भी पेशेवर के लिए थकाऊ और असंतुलित है। इसके साथ ही अन्य प्रशासनिक कार्यों का बोझ अलग से है।
शिक्षक संगठनों द्वारा उठाए गए सवाल पूरी तरह से जायज़ हैं। उनका कहना है कि सरकार के किसी भी कार्यक्रम—चाहे वह जनगणना हो, चुनाव हो, सर्वेक्षण हो या स्वास्थ्य अभियान—सबसे पहले शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जाती है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन इसका असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। शिक्षक, जो समाज के बौद्धिक निर्माण की धुरी हैं, उन्हें हर क्षेत्र में “सर्वसुलभ कर्मचारी” के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
स्थिति तब और जटिल हो जाती है, जब लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को पुनः पात्रता परीक्षाओं के दायरे में लाया जाता है। 20-25 वर्षों से अध्यापन कर रहे अनुभवी शिक्षकों को अचानक यह साबित करने के लिए कहा जाता है कि वे पढ़ाने के योग्य हैं या नहीं। यह निर्णय न केवल उनके अनुभव का अपमान है, बल्कि उनके मनोबल को भी कमजोर करता है। यदि यही तर्क लागू किया जाए, तो अन्य प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत अधिकारियों की भी समय-समय पर पुनः पात्रता परीक्षा होनी चाहिए, लेकिन ऐसा केवल शिक्षकों के साथ ही क्यों?
यह दोहरा रवैया स्पष्ट करता है कि शिक्षा क्षेत्र को अभी भी वह सम्मान और प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है, जिसकी उसे आवश्यकता है। एक ओर सरकारें शिक्षा के स्तर को सुधारने की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझाकर उनके मुख्य कार्य से भटका देती हैं। यह विरोधाभास नीतिगत असंतुलन को दर्शाता है।
शिक्षकों की भूमिका केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं होती, बल्कि वे समाज के मूल्य, संस्कार और भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि वही शिक्षक प्रशासनिक बोझ के नीचे दबे रहेंगे, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए आवश्यक है कि शिक्षक मानसिक और शारीरिक रूप से संतुलित रहें। उनके पास तैयारी और अध्यापन के लिए पर्याप्त समय हो।
समाधान के रूप में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिक्षकों को केवल शैक्षणिक कार्यों तक सीमित रखा जाए। गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिए अलग से मानव संसाधन की व्यवस्था की जानी चाहिए। साथ ही अनुभवी शिक्षकों के सम्मान और उनकी विशेषज्ञता को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनाई जानी चाहिए, न कि उन्हें बार-बार संदेह के दायरे में खड़ा किया जाए। यह समझना होगा कि शिक्षा व्यवस्था की मजबूती ही किसी भी समाज की प्रगति की आधारशिला होती है। यदि शिक्षक ही असंतुष्ट और दबाव में रहेंगे, तो इसका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों और भविष्य पर पड़ेगा। इसलिए समय आ गया है कि “छुट्टी के नाम पर ड्यूटी” जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त कर शिक्षकों को उनका वास्तविक सम्मान और कार्यक्षेत्र लौटाया जाए।