भोपाल, 02 नवंबर।
बीस रुपये की दवा बाईस सौ रुपये में बेचना व्यापार नहीं, हत्या है। दवाओं की बेलगाम कीमतों पर किसी का नियंत्रण नहीं है। यह अराजकता नहीं, संगठित लूट है। दवा की विनिर्माण लागत बीस रुपये और पैकिंग के साथ कीमत बाईस सौ रुपये। यह अंतर नहीं, डकैती है। यह डकैती दिनदहाड़े अस्पतालों के गलियारों में मरीजों की आंखों के सामने हो रही है और सरकारें आंखें बंद किए बैठी हैं। दवा को जीवनरक्षक कहा जाता है, पर बाजार में इसे सोने से महंगा बना दिया गया है। कैंसर या हृदय रोग की दवा खरीदने के लिए आम आदमी कर्ज लेता है, जमीन बेचता है और फिर भी कई बार जान नहीं बचा पाता, क्योंकि इलाज से पहले ही लूट उसे तोड़ देती है।
राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 543 ब्रांडेड दवाओं और 137 कैंसररोधी दवाओं पर ट्रेड मार्जिन सीमित करने का निर्णय लिया। सुप्रीम कोर्ट की चिंता के बाद यह कदम उठाया गया, पर सवाल यह है कि बाकी हजारों दवाओं का क्या होगा? क्या मरीज केवल इन्हीं दवाओं से बीमार होते हैं? सरकार स्वीकार करती है कि उत्पादन लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच बड़ा अंतर है, तो फिर यह अंतर आज तक क्यों बना हुआ है? स्वास्थ्य संबंधी संसदीय समिति कई बार चिंता जता चुकी है, लेकिन चिंता जताने से कीमतें कम नहीं होतीं, कार्रवाई से होती हैं। कार्रवाई कहीं दिखाई नहीं देती।
सरकार ने ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने के फैसले को सही दिशा में उठाया गया कदम बताया, लेकिन यह भी सवालों से परे नहीं है। बीस रुपये की चीज पर 30 प्रतिशत जोड़ने से कीमत छब्बीस रुपये होती है, बाईस सौ रुपये नहीं। लागत बीस रुपये और एमआरपी बाईस सौ रुपये हो, तो इसे 30 प्रतिशत मार्जिन का नाम कैसे दिया जा सकता है? यह मुनाफा नहीं, मरीजों के साथ अन्याय है। अस्पतालों में बिकने वाली दवाओं की कीमतों पर पारदर्शिता और प्रभावी नियंत्रण का अभाव है। डॉक्टर दवा लिखता है, मेडिकल स्टोर देता है और मरीज चुपचाप लुटता है। सुप्रीम कोर्ट ने महंगी दवाओं और अस्पतालों के माध्यम से बेची जाने वाली दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण को लेकर सवाल उठाए हैं। सरकार को इसका ठोस जवाब देना होगा।
दवा निर्माताओं, नौकरशाहों और उन्हें संरक्षण देने वाले गठजोड़ को कौन तोड़ेगा? यह सवाल हर घर में गूंज रहा है। दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच हितों के टकराव की आशंकाओं से लेकर सरकारी खरीद में कीमतों की पारदर्शिता तक, हर स्तर पर जवाबदेही जरूरी है। सरकारी अस्पतालों में भी मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जेनेरिक दवाएं लिखने के नियम कागजों पर हैं, लेकिन उनका प्रभावी पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। ब्रांडेड दवाओं की बिक्री से जुड़े प्रोत्साहनों और कमीशन की व्यवस्था पर भी सख्त निगरानी होनी चाहिए।
दवा कंपनियां अनुसंधान और नवाचार की लागत का हवाला देकर ऊंची कीमतों को उचित ठहराती हैं। लेकिन एक ही सॉल्ट की दवा अलग-अलग कंपनियां दस रुपये से दो हजार रुपये तक में कैसे बेचती हैं? पेटेंट के अधिकार जरूरी हैं, लेकिन उनकी आड़ में जीवनरक्षक दवाओं को आम आदमी की पहुंच से बाहर नहीं किया जा सकता। सरकारों को इस पर गंभीर सवाल उठाने चाहिए और जनता के हितों की रक्षा करनी चाहिए।
अब बहुत हो गया। सरकार को जागना होगा। हर दवा की लागत और मूल्य निर्धारण का आधार पारदर्शी बनाया जाए। ट्रेड मार्जिन पर प्रभावी नियंत्रण हो, अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई हो। एनपीपीए को केवल 543 दवाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे दवा बाजार पर प्रभावी निगरानी रखनी चाहिए। यदि सरकारें अब भी नहीं जागीं, तो इतिहास यही दर्ज करेगा कि इस देश में मरीजों को बीमारी के साथ-साथ दवाओं की महंगाई और व्यवस्था की लापरवाही ने भी मारा, जबकि सरकारें देखती रहीं।














