डॉ. प्रमोद शंकर सोनी
हमारा देश विश्व में सर्वाधिक तीज-त्योहारों के लिए जाना जाता है—जहां हर दूसरे दिन कोई न कोई उत्सव मनाया जा सकता है। पर आधुनिक समय में त्योहारों को मनाने का तरीका और शैली चिंताजनक रूप से बदल गई है। आज यदि किसी पर्व में अत्यधिक तेज़ डीजे और ध्वनि के अन्य साधन न हों, तो मानो उत्सव अधूरा रह गया हो। चल समारोह, उसके पीछे कान फोड़ देने वाला डीजे का शोर और उसके बीच भौंडा नृत्य करते लोग अब सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय संवेदनशीलता का प्रश्न बन चुके हैं। चल समारोह हो या शादी-ब्याह के जुलूस, ध्वनि कम करने की संवेदना मानो विलुप्त हो चुकी है; मानो ध्वनि की तीव्रता ही उत्सव की “भव्यता” का मापदंड बन गई है।
चैत्र नवरात्रों के एक दिन का मेरा अनुभव इस पीड़ा को और गहरा कर देता है। क्लीनिक जाते समय एक चल समारोह का शोर कार के बंद शीशों को भेदता हुआ पूरे शरीर में कंपन पैदा कर रहा था। क्लीनिक पहुंचने पर, लगभग 500 मीटर दूर स्थापित देवी स्थल से आ रही तीव्र ध्वनि के बीच एक बाहर खड़ा मरीज चक्कर खाकर गिर पड़ा, तो दूसरे को माइग्रेन का तीव्र दौरा पड़ गया और वह उल्टियों से व्याकुल हो उठा। एयर-टाइट कमरे में भी मरीज के साथ मेरा संवाद असंभव हो गया—न मैं उनकी बात सुन सका, न वे मेरी। अंततः मुझे उन्हें दूसरे दिन का अपॉइंटमेंट देकर लौटाना पड़ा। सच मानिए, उस क्षण एक चिकित्सक के रूप में भीतर बेहद मिश्रित भावनाएं उमड़ रही थीं—एक तरफ हमारे धर्म और संस्कृति की पवित्रता, तो दूसरी ओर हृदय को दहला देने वाला ऐसा शोर, जो श्रद्धा के स्थान पर वितृष्णा और घोर क्षोभ उत्पन्न कर रहा था।
जरा ठहरकर सोचिए—जब मेरे बंद चैंबर में बाहर से आ रहा शोर इतना असह्य हो रहा था, तो उस राक्षस-रूपी, गला फाड़कर चिंघाड़ते डीजे के असहनीय कोलाहल से खुले में खड़े लोगों, आसपास के घरों, बुजुर्गों, नवजात शिशुओं और परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता होगा? जरा गंभीरता से विचार करें, क्या किसी बच्चे की पढ़ाई, किसी रोगी की नींद, किसी वृद्ध की शांति हमारे उत्सव से कम महत्वपूर्ण हो गई है? क्या हमारी खुशी अब दूसरों की पीड़ा पर निर्भर होने लगी है?
हम प्रदूषण की चर्चा में वायु, जल, मृदा और प्लास्टिक को तो याद रखते हैं, पर ध्वनि प्रदूषण, जो सीधे हमारे हृदय, मस्तिष्क और मानसिक संतुलन को प्रभावित करता है, अब भी उपेक्षित है। 70-75 dB तक की आवाज सामान्य मानी जाती है और 85 डेसिमल से ऊपर की ध्वनि हमारे कानों के लिए बेहद खतरनाक हो जाती है। वहीं उत्सवों में बजने वाले इन डीजे की आवाज 120-130 डेसिमल या उससे भी अधिक होती है, जो न केवल हमारे कानों, बल्कि संपूर्ण शरीर को भारी क्षति पहुंचा सकती है।
शोर रूपी यह अदृश्य विष धीरे-धीरे हमारे भीतर चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, तनाव और डिप्रेशन जैसे रोगों का बीज बो रहा है, और दुख की बात यह है कि हम इसे “उत्सव” का नाम देकर स्वीकार भी कर रहे हैं। आज सबसे बड़ी विडंबना यह हो गई है कि जिन त्योहारों का मूल भाव भक्ति, मानसिक शांति, आनंद और सामूहिक सौहार्द था, वे अब भौंडे प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा में बदलते जा रहे हैं। भक्ति और शांति का स्थान कानफोड़ू, हृदयाघाती शोर ने ले लिया है, और देवी आराधना के इन 9 पवित्र दिनों में फलाहार पर उपवास करते हुए मन-मस्तिष्क को शांत और एकाग्र बनाने के लिए प्रयासरत साधकों को शांति के स्थान पर भयंकर चिड़चिड़ापन, बेचैनी और घबराहट का अहसास हो रहा है। दुर्भाग्य से, साल-दर-साल शोर और दिखावे की यह स्थिति बढ़ती ही जा रही है, और शासन-प्रशासन आंख और कान पर धर्मांधता की पट्टी बांधे सो रहा है। यह स्थिति कुल मिलाकर हमारी आदर्श, शालीनता से मनाई जाने वाली परंपरा का विकृतिकरण ही दर्शाती है।
प्रशासन को इसके लिए न केवल कठोर नियम बनाने की आवश्यकता है, बल्कि सख्ती से उनका क्रियान्वयन भी कराना जरूरी है। एक निर्धारित स्तर से अधिक ध्वनि पर संगीत बजाने पर कड़ी सजा का प्रावधान न केवल रात्रि में, बल्कि चौबीसों घंटे लागू होना चाहिए। इसके साथ ही स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में साउंड लिमिटर जैसे उपायों को अनिवार्य किया जाना चाहिए। इन सब उपायों के अतिरिक्त, हम सभी को सामाजिक तौर पर जागरूक होना पड़ेगा और इस बात का सामना करते हुए स्वयं से यह प्रश्न करना होगा कि क्या हम सच में उत्सव मना रहे हैं, या केवल शोर कर रहे हैं? आज हमें इस बात की समझ बेहद जरूरी है कि उत्सव का अर्थ केवल उल्लास नहीं, बल्कि संतुलन भी है—ऐसा संतुलन, जिसमें हमारी खुशी के साथ-साथ दूसरों की शांति भी सुरक्षित रहे।