मुंबई, 08 मई।
प्रख्यात लेखिका एवं समाजसेविका डॉ. शोभा विजेन्द्र ने कहा है कि संघ की विचारधारा से उत्पन्न कार्य और चिंतन पूरी तरह से महिला केंद्रित हैं। उनके अनुसार परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की भूमिका अनिवार्य है, और बिना उनके योगदान के राष्ट्र निर्माण की कल्पना संभव नहीं है।
मुंबई के वर्ली स्थित नेहरू सेंटर के हॉल ऑफ हार्मनी में आयोजित “संघ शतायु और महिला सहभागिता” विषयक चर्चा कार्यक्रम में उन्होंने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि संघ परिवार में पले-बढ़ने के कारण उनके भीतर राष्ट्र सेवा की भावना विकसित हुई, जिसमें “मैं नहीं, तू” का भाव प्रमुख रहा।
उन्होंने यह भी कहा कि उनके लेखन में यह प्रमाणित किया गया है कि संघ में महिलाओं की भूमिका केवल सहभागिता तक सीमित नहीं है, बल्कि वहाँ स्त्री को माँ, मातृभूमि और जगन्माता के रूप में भी देखा जाता है।
कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता गीता ताई गुंडे का सम्मान किया गया। उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा कि महिलाएँ आज कई महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच रही हैं, लेकिन नीति निर्माण में उनकी भागीदारी अभी भी अपेक्षाकृत कम है। उन्होंने महिलाओं के आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन में कहा कि संघ के सभी कार्यों में मातृशक्ति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है और संगठन समाज को साथ लेकर चलने की दिशा में कार्य करता है।
मुख्य वक्ता ने बताया कि महिलाएँ संघ से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में सक्रिय रूप से जुड़ी हैं और आपातकाल के दौरान भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने वनवासी कल्याण आश्रम जैसे कार्यों में महिलाओं की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही वक्ता ने कहा कि संघ में स्त्री और पुरुष को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता है। वहीं एक अन्य वक्ता ने कहा कि महिलाएँ घर और संगठन दोनों में समान दक्षता और समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियाँ निभाती हैं।



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