संपादकीय
06 May, 2026

शहरों में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण: अदृश्य खतरा, गंभीर परिणाम

शहरों में लगातार बढ़ते ध्वनि प्रदूषण से स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति और सामाजिक जीवन पर गंभीर असर पड़ रहा है, जिससे यह एक बड़ी सार्वजनिक चुनौती बनता जा रहा है।

06 मई।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की लगातार चेतावनियों के बावजूद हम वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार लोगों द्वारा की जा रही गंभीर लापरवाहियों को तो नहीं रोक पा रहे हैं, लेकिन एक और मानवीय भूल के कारण ध्वनि प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है। ध्वनि प्रदूषण के कारण बहरापन, हार्ट अटैक और मस्तिष्क संबंधी बीमारियां बढ़ रही हैं। अब तक हम वायु प्रदूषण को ही बीमारियों का प्रमुख कारण मानते रहे हैं, लेकिन हालिया सर्वेक्षणों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रियल-टाइम आंकड़ों ने एक नई और चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है।
अब यह स्पष्ट हो चुका है कि आवासीय इलाकों में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और कामकाजी वर्ग के लिए यह एक बड़ा खतरा बन चुका है। रिपोर्ट के अनुसार शहरों के साइलेंस जोन, जहां शांति बनाए रखना अनिवार्य होता है, वहां भी ध्वनि स्तर मानकों से 20 प्रतिशत अधिक पाया गया है। जहां आदर्श रूप से ध्वनि स्तर दिन में 50 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल से कम होना चाहिए, वहीं कई शहरी इलाकों में यह स्तर 60 से 70 डेसिबल तक पहुंच चुका है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों और भारी यातायात वाले मार्गों पर तो 63.7 डेसिबल तक शोर दर्ज किया गया है।
दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि कुछ औद्योगिक क्षेत्रों जैसे गोविंदपुरा में आवासीय क्षेत्रों की तुलना में कम ध्वनि प्रदूषण पाया गया है। यह स्थिति बताती है कि शहरों के रहने योग्य क्षेत्रों में नियंत्रण की कमी अधिक है।
ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में वाहनों की बढ़ती संख्या और प्रेशर हॉर्न का अनियंत्रित उपयोग, होटल, मैरिज गार्डन और अन्य आयोजन स्थलों में तेज़ डीजे और लाउडस्पीकर, सड़कों पर जुलूस, रैलियां और धार्मिक आयोजन, तथा निर्माण कार्य और मशीनों का शोर शामिल हैं। हालांकि डीजे और लाउडस्पीकर के लिए प्रशासन से अनुमति ली जाती है, लेकिन वास्तविकता में नियमों का पालन नहीं होता। अनुमति सीमित ध्वनि स्तर के लिए दी जाती है, लेकिन मौके पर शोर कई गुना अधिक होता है।
नगर निगम और जिला प्रशासन की भूमिका इस समस्या में अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी लापरवाही साफ दिखाई देती है। नियम तो बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। पुलिस प्रशासन भी केवल अनुमति देने तक सीमित रह जाता है, जबकि निगरानी और नियंत्रण की जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से नहीं निभाई जाती। प्रेशर हॉर्न पर प्रतिबंध होने के बावजूद उनका खुलेआम उपयोग हो रहा है। डीजे रात देर तक बजते रहते हैं, जिससे आसपास के रहवासियों की नींद और स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होते हैं।
ध्वनि प्रदूषण केवल असुविधा नहीं है, बल्कि यह कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। लगातार तेज़ शोर के संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता कमजोर हो सकती है, यहां तक कि बहरापन भी हो सकता है। मानसिक तनाव, चिंता, चिड़चिड़ापन और अवसाद बढ़ सकता है। नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है, जिससे थकान और कार्यक्षमता में कमी आती है। उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का खतरा बढ़ता है, और हार्ट अटैक जैसी गंभीर स्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों और बुजुर्गों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ता है। बच्चों की एकाग्रता, स्मरण शक्ति और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है, जबकि बुजुर्गों में मानसिक और शारीरिक समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं।
ध्वनि प्रदूषण केवल शारीरिक स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक जीवन को भी प्रभावित करता है। लगातार शोर के कारण व्यक्ति में चिड़चिड़ापन बढ़ता है, आपसी संबंधों में तनाव आता है और जीवन की गुणवत्ता गिरती है। शहरों में रहने वाले लोग अब शांति के लिए तरसने लगे हैं।
इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक है। प्रशासन को चाहिए कि ध्वनि स्तर के नियमों का सख्ती से पालन करवाए। निगरानी व्यवस्था मजबूत हो, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और नियमित जांच सुनिश्चित की जाए। प्रेशर हॉर्न पर सख्त कार्रवाई हो और नियम तोड़ने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। डीजे और लाउडस्पीकर के लिए ध्वनि सीमा का सख्ती से पालन कराया जाए। साथ ही, जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक किया जाए।
ध्वनि प्रदूषण एक ऐसा खतरा है जो दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके प्रभाव गहरे और दीर्घकालिक होते हैं। यह केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह और भी भयावह रूप ले सकता है। अब समय आ गया है कि प्रशासन, समाज और हर नागरिक मिलकर इस समस्या को गंभीरता से लें और ठोस कदम उठाएं, ताकि शहर फिर से रहने योग्य और शांतिपूर्ण बन सकें। 
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