मानस भवन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद प्रशासनिक लापरवाही, पुनर्वास की कमी और वर्षों से चली आ रही अनदेखी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
06 मई।
मानस भवन के पास हिंदी भवन से सटी बस्ती पर चली कार्रवाई सिर्फ “अतिक्रमण हटाओ” अभियान नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की लंबी, गहरी और खतरनाक लापरवाही का आईना है। सवाल साफ है—जब यह अतिक्रमण आज अवैध है, तो क्या बीस साल पहले वैध था? अगर नहीं, तो फिर इसे पनपने किसने दिया?
प्रशासन का तर्क है कि सरकारी जमीन को मुक्त कराना जरूरी है। यह बात सही है, लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि इस अवैध कब्जे को वर्षों तक नजरअंदाज किया गया। यह कोई एक-दो दिन में खड़ी हुई बस्ती नहीं थी। यहां पीढ़ियां बस गईं, घर पक्के हो गए, बिजली-पानी के कनेक्शन तक पहुंच गए। क्या यह सब बिना सरकारी तंत्र की मौन सहमति के संभव था? स्पष्ट रूप से नहीं।
यही वह बिंदु है जहां प्रशासन की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर अतिक्रमण कानून के खिलाफ था, तो शुरुआत में ही कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्यों सरकारी अधिकारी, स्थानीय निकाय और संबंधित विभाग आंखें मूंदे बैठे रहे? यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि प्रणालीगत विफलता है और संभवतः मिलीभगत भी।
विडंबना यह है कि अब, जब जमीन “कीमती” हो गई या विकास योजनाओं के रास्ते में आ गई, तो अचानक कानून की याद आ गई। बुलडोज़र चलाकर प्रशासन अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है, लेकिन जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस अतिक्रमण को फलने-फूलने दिया, उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। क्या यह न्याय है या सिर्फ दिखावटी सख्ती?
राजनीतिक विरोध भी इस पूरे प्रकरण में पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगता। जो नेता आज विस्थापन का विरोध कर रहे हैं, वे भी उसी व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं जिसने इस समस्या को जन्म दिया। यह विरोध कहीं न कहीं राजनीतिक लाभ की कोशिश ज्यादा और वास्तविक संवेदनशीलता कम प्रतीत होता है।
सबसे गंभीर सवाल पुनर्वास को लेकर है। जिन लोगों के घर तोड़े जा रहे हैं, उनके लिए क्या विकल्प है? क्या उन्हें सिर्फ “अवैध कब्जाधारी” कहकर छोड़ देना पर्याप्त है? अगर राज्य ने उन्हें वर्षों तक वहां रहने दिया, तो उसकी भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि विस्थापन मानवीय तरीके से हो।
अब वक्त है कि कार्रवाई सिर्फ गरीबों के घरों तक सीमित न रहे। जिन अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय प्रतिनिधियों की लापरवाही या मिलीभगत से यह अतिक्रमण खड़ा हुआ, उनके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। जवाबदेही एकतरफा नहीं हो सकती।
यह मामला सिर्फ एक बस्ती का नहीं, बल्कि उस सोच का है जहां सरकारें पहले समस्या को बढ़ने देती हैं और फिर अचानक उसे बलपूर्वक खत्म करने निकल पड़ती हैं। अगर यही रवैया जारी रहा, तो “विकास” के नाम पर ऐसे टकराव बार-बार होते रहेंगे, और हर बार सबसे बड़ी कीमत वही चुकाएगा जो सबसे कमजोर है।